Monday, May 23, 2016

क्यों न पत्थर को उछाला जाए

बह्र: 2122 1122 22 (112)

जब तलक दिल पे निशां आ जाए
महफिलों को न सजाया जाए

गम ज़दा हम न रहे एक पल भी
पल को फिर ख़ास बनाया जाए

छेड़ना और नहीं इस दिल को
प्यार का दौर कहीं आ जाए

रात कुछ और गुज़र जाए तो
आग से आग बुझाया जाए

तू रहा खास सभी बातों में
क्यों न हमराज़ बनाया जाए

देख नाकाम रही किसमत भी
क्यों न पत्थर को उछाला जाए

जुल्फ-ए-तहरीर लिखी होती है
ध्यान से पढ़ के बताया जाए

ख्वाब में जिन्दे कई मिलते है
आह इनको न लगाया जाए

~ सूफ़ी बेनाम


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