Wednesday, July 31, 2013

तयककुन (reality)

मोहब्बत में तेरी ना सही ना सही,
ये दिल गुनहगार किसी का तो है ?
हार और जीत का फैसला क्या करें
अपने कातिल को खुदगरजी का शिकार क्या कहें ?

तकलीफ़ तो तुमको भी रही ए ज़िन्दगी
अब दर्द का इक़बाल ना सही ना सही
जी ही लो रस्मों-रिवाज़-ऐ-ख़लिश
किसी की बेलगामी को परवाज़ क्या कहें ?

और तड़प तो उन चंद अल्फाज़ों की थी
दुश्मनी, दोस्ती ना सही ना सही
लफ्ज़ों की बुनी चादर से क्या प्यार करें क्या रुसवाई
तुम्ही हो दर्द जगाये क्या कहें ?

मुझे गुमान है ए ज़िन्दगी अपनी राह पर
किसी का साथ ना सही ना सही
बेकार रहा तजुर्बा इस खेल में,
हर पल नया मोड़, हर रोज़ नयी बिसात क्या कहें ?

~ सूफी बेनाम


Monday, July 1, 2013

स्याही से बहा फिर एक ख्व़ाब

कोई ख्वाब स्याही से बहता रहा
और यादों में दायरे फिर घुल गये?

रुके तुम भी थोडा पर ठहरे नहीं
ख्याल में भी बेक़रार लहरों से थे?

ये हरारत नये मोड़ लाती रही
रात करवटों पे सहरा बदलते रहे

नींद आती नहीं अब सवालों को है
मुफलिसी क्यों आज चिरागों में है ?

किस नए ख्याल को अब ढूंदा करें
ज़िन्दगी हर फिज़ा को दोहराती जो है।

हो मुनासिब, ज़मी पे चल के तो दिखा
इस काफिले के गुनेहगार हुम-दोनो ही हैं।

~ सूफी बेनाम