Friday, December 30, 2016

दिल फ़रेब उम्र पैतालीस की

बड़ा ही जीवट वो
एक नन्हा बच्चा
जिसको सज़ा-ए-नीलडाउन में
नाचते हुए देख कर
हम अपने भीतर के
निःस्तब्ध बचपन को
खंरोचते थे
चाहते थे कि
कहीं तो मेरे अंदर
कुछ हलचल हो
और उस सा चंचल
हो जाऊं
मेरा दोस्त था वो


एक नन्हा बच्चा
जिसे मैं बचपन से जानता था
जीवन की दिल फरेबी से
उम्र पैतालिस में
उसी क़ुएसचन- पेपर
की तरह रुस के वैसे ही
जा छुपा है जैसे
बचपन में बेजवाब सवालों
से लदे प्रशन पत्र
हमारी नासमझी
हमारी नक़ाबीलियत का प्रमाण
रिपोर्ट कार्ड में
खोल खोल देते थे।
मेरा दोस्त था वो .................


~ सूफ़ी बेनाम

नीलडाउन - kneel-down ; 

Remembering Anil Bhatia ( a class mate from St. Aloysius), who left us all of a sudden, unannounced at 45. 





Thursday, December 22, 2016

काश हद खुद की हम सिए होते



अब्दुल हमीद अदम के एक मिसरे में गिरह देकर ग़ज़ल में उतरने की कोशिश :
वज़्न - 2122 1212 22 / 112
अर्कान - फाइलातुन मुफ़ाईलुन फैलुन
बह्र - बह्रे खफी़फ मुसद्दस मख्बून
काफ़िया - ए (स्वर)
रदीफ़ - होते

गिरह :
आस भर कर उफन उठी लहरें
काश थोड़ी सी हम पिए होते

मतला :
दिल शिकन चार तो दिए होते
दर्द ले साथ हम जिए होते

वक़्त वीरान सी पहेली है
गुफ़्तगू आप ही किए होते

आशना आप और पहेली भी
सांस पे सांस से गुदे होते

छू सके गर नहीं तुम्हे लब से
अक्स को चूम कर जिए होते

राज़दां दिलबरी रही तुम से
काश हद खुद की हम सिए होते

करवटें आप तक न दें पहुंचा
ख़्वाब निगरान तो किए होते

तापते रह गये दिल-ए-ज़ीनत
सर्द बेनाम ही जले होते

~ सूफ़ी बेनाम







Monday, December 12, 2016

जो नहीं जानते मज़हब की दवा देते हैं

जनाब साहिर लुधियानवी साहब के मिसरे में गिरह दे कर ग़ज़ल में उतरने की कोशिश
गिरह :

इश्क़ की आह पे पीता गया तम का प्याला
आप अब शौक से दे लें जो सज़ा देते हैं

मतला :

जीते वो ही हैं जो हर दिन को जला देते हैं
खोजते नौ को हैं यादों को सुला देते हैं

रात अब तलक नहीं भूल सकी वो हसरत
ख्वाब रातों को यूं मखमल की सज़ा देते हैं

प्यास की स्याह तलब और नफ़ी की आदत
जो नहीं जानते मज़हब की दवा देते हैं

भूल कर आप का घर राह की मंज़िल पे हम
गोया परछाई हक़ीक़त में मिला देते हैं

हम भी बेनाम रहे यूं कि दिलों के प्याले
अश्क़ में अस्ल को हर रोज़ जगा देते हैं

~ सूफ़ी बेनाम


-- 2122 1122 1122 22/112


नक़ाब

मेरे नक़ाब को अपनी आँखे चुभाने वाले
कभी मुझे छू के महसूस तो किया होता
ज़िन्दा वो झूठ भी हैं जो राज़ बने रहते हैं
माँस ये चेहरे को महसूस तो किया होता
लाल लहू उतना ही है नकाब का जितना
असल के चहरों ने था हर रोज़ पिया होता
काश तू उन से अलग होता उनसे जिनने
सच के वास्ते सौ झूठ क़त्ल किया होता।

~ सूफ़ी बेनाम


वरदा

खैरियत बंदिशों में है तब तक
बह्र तूफ़ां जगा रही जब तक

आसरे जो रहा हवाओं के
वो सफीना नहीं मिला अब तक

दरमियां आप भी पहेली भी
नज़र तूफ़ां से जा मिली तब तक

डूबना इश्क़ में बेमानी था
मिल रही चाह गर हो मतलब तक

टूटने लग गये सभी अपने
आरज़ू हो गयी नफ़ी लब तक

मौत दो चार की हुई जिनको
घर नहीं शहर दे सका अब तक

छूट कर ज़ुल्फ़ से गिरा वरदा
आज तो खैरियत रहे शब तक।
or
छूट कर ज़ुल्फ़ से गिरा वरदा
आब -ओ -गिल अमन रहे शब तक।

~ सूफ़ी बेनाम

2122 1212 22 / 112

वरदा - red rose, बह्र - meter in poetry /ocean, सफीना - boat, नफ़ी - forbidden, denial, आब -ओ -गिल - water and earth - elements of nature


ख्वाइशों के डोडे

अब
अतीत का शोर
वर्तमानी-दरीचों के
पारभासी काँच से भरे
नाज़ुक दिलहों पर
दस्तक़ नहीं करता ।
 
न ही
भविष्य की अफवाहें
कुरेदती हैं उम्मीद के
फाहों से
आज के नाखूनों में
गुदे हिसाब-क़िताब।
व्यग्र-उद्वेग वासना भी
अपनी बेमियादी
की घोषणा
बदन की सतह पर
करके
धमनियों में प्रवाहित
होने के लिये
एक स्पर्श के आभाव से
शेर दर शेर
ग़ज़लों में
जमने लगी हैं।
मौसम सर्द गर्म
और बारिश के सिवा
अब कुछ भी नहीं।
मुराद-ए-वस्ल
जगती है
दिखती हैं
मज़ाक बनती हैं
ग़ुज़र जाती हैं।
नर्म तकिये भी
ख्वाइशों के डोडों से फूट-कर
सेमल से  
रेशमी नकाब चढे
कुछ बीज
ले उड़े हैं।

तुम सुनाओ .........
क्या ये बीज
तुम्हारी ख्वाइशों के
फ़ित्ना-गर गिल की
नमी पे
अंकुर तो नहीं
छोड़ बैठे हैं ?

~ सूफ़ी बेनाम


Saturday, December 3, 2016

ख़्वाब खुद नहीं चल पाते कभी

वज़्न - 2122 2122 212
अर्कान - फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
बह्र - बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ
क़ाफ़िया - आया
रदीफ़ - देर तक
मशहूर शायर आदरणीय नवाज़ देवबंदी जी के मिसरे में गिरह दे कर ग़ज़ल में उतरने की कोशिश :

मोड़ वीराने पे रुकना हमसफ़र
धूप रहती है न साया देर तक

मतला :
ख्वाब का दर खटखटाया देर तक
रात ने हमको नचाया देर तक

करवटों में पल रहे थे सपने जो
अदब का मतलब सिखाया देर तक

आस एक सोकी थी सिरहाने ने यूं
पास रहकर दिल जलाया देर तक

सच चुभा करते नहीं पैरों में जो
झूठ बन कर फिर रुलाया देर तक

साँस जब भी आशना मिलती नहीं
अखतरों ने टिमटिमाया देर तक

ख़्वाब खुद नहीं चल पाते कभी
रात कर्ज़ों को चुकाया देर तक

साथ तेरा फिर पहेली था बना
महज़ एक वादा निभाया देर तक

~ सूफ़ी बेनाम 
















Wednesday, November 30, 2016

हर कश-ए-राख पालता है मुझे


वज़्न - 2122 1212 22 / 112
अर्कान - फाइलातुन मुफ़ाईलुन फैलुन
बह्र - बह्रे खफी़फ मुसद्दस मख्बून
काफ़िया - अता
रदीफ़ - है मुझे

बेकल उत्साही साहब का एक शेर है :
"होने देता नही उदास कभी
क्या कहूँ कितना चाहता है मुझे"

उसके सानी मिसरे पे गिरह देते हुए ग़ज़ल में उतरने की कोशिश :

गिरह :
जल गया दो कशों की ज़हमत पर
क्या कहूँ कितना चाहता है मुझेै

मतला :
ज़िक्र उसका इरादता है मुझे
आदते-ए-शौक़ मारता है मुझे

साँस की दो खलिश पे ज़िन्दा जो
आशिया का नशा अता है मुझे

ग़र्क़ ख्वाइश, धुंआ नसीबों का
ऐश-टरों में बिखेरता है मुझे

चाहतें कुछ सुलगती हैं अक्सर
हर कश-ए-राख पालता है मुझे

मयकशां यार की सुहूलत हूँ
बेतकल्लुफ़ क्यूँ मानता है मुझे !

जो रिहा है धुओं के छल्लों में
हमसुख़न साज़ मानता है मुझे

सिगरटें चाय की दुकानों पर
गुज़रता वक़्त जानता है मुझे

गर्त कोई हवा की भर कर वो
लब-नशीनी से साधता है मुझे

शायरा-शौक और बेनामी !
बदहवास खूब खींचता है मुझे

~ सूफ़ी बेनाम



Friday, November 25, 2016

थोड़ा गोलाई से

चट्टान को चट्टान की 
नोकीली पेचीदा
चढ़ाई पर धकेलना
वैसे ही है जैसे
ढलती हुई उम्र में
मोहब्बत निभाना 
और जैसे
सांसों के दरमियाँ ज़िंदा से
ज़िन्दगी समझना समझाना।

चट्टान को चट्टान की
चढ़ाई पर धकेलना
संभव है मगर 
आलिम कहते है
थोड़ा गोलाई से 
हौले-हौले।

~ सूफ़ी बेनाम


Thursday, November 17, 2016

कौन समझे ये काफ़िरी क्या है

वज़्न - 2122 1212 22 / 112
अर्कान - फाइलातुन मुफ़ाईलुन फैलुन
बह्र - बह्रे खफी़फ मुसद्दस मख्बून
काफ़िया - ई ( स्वर ); रदीफ़ - क्या है
मिसरा....
"हमसे पूछो कि खुदकुशी क्या है"

गिरह :
महज़ सांसों में ज़िन्दगी क्या है
हम से पूछो कि खुदकुशी क्या है

मतला :
हसरतें इस कदर दबी क्या है
दिल न टूटा तो आदमी क्या है

ख़्याल की ख़्याल पर मीनारें सौ
अब पता क्या कि आखिरी क्या है

काफिये काम अब नहीं आते
बे-बहर नज़्म फिर सजी क्या है

फूस की छत तले जो ज़िन्दा थे
उनसे पूछो कि मौसकी क्या है

शायरी काम हैं अदीबों का
कौन समझे ये काफ़िरी क्या है

नफ़रतें दासतां बनी अक्सर
इश्क़ में खोई ज़िन्दगी क्या है

कोई तिनका हवा से पूछे तो
आज फिर सज के वो चली क्या है

ग़र्क़ चाहत पे और नफ़रत पे
कौन जाने ये मुद्दयी क्या है

फैसले इस तरह बढ़ायेंगे
आसमाँ और ये ज़मी क्या है

आज बेनाम को नहीं रोको
खुद समझने दो दिल्लगी क्या है

~ सूफ़ी बेनाम















Wednesday, October 19, 2016

निद्र-बोध

उस
दो-चौबीस की मुस्कराहट को
सुबह चार बजे देखा।
अचेत
बंद आंखों के भीतर
ख्याल को खुद-आगोश में कसे
रात के दर्पणों से अनभिज्ञ
निद्र-बोध संवाद की पटरियों पर
सरकती हुई
पुराने पते पर ही पहुंची होगी।
अब उसको कौन बताये
कि वो
चाँद से लौट आये।
~ सूफ़ी बेनाम

 

Monday, October 17, 2016

बहुत था दर्द लेकिन इस सफर में

1222 1222 122
बह्र - बह्रे हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़
अर्कान - मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फऊलुन
काफ़िया - ए (स्वर), रदीफ़ - बोलते हैं

गिरह:
बहुत था दर्द लेकिन इस सफर में 
बड़े चुप हों तो छोटे बोलते हैं

मतला :
पशेमाँ खत तुम्हारे बोलते हैं
हज़ारों मील पीछे बोलते हैं

उड़ानो की तुम्ही आगाज़ करना
हवाओं के ठिकाने बोलते हैं

उठो नाकामियों से जा के कह दो
अज़ल के भी हवाले बोलते हैं

वहीं परछाइयां बहकी तुमारी
किसी आँचल के साये बोलते हैं

उड़ा कुछ ज़ख्म से, ले कर दरिंदा
हलक उसके निवाले बोलते हैं

निगाहों में ज़रा ठहराव लाओ
शुआओं से वो लम्हे बोलते हैं

ज़रा गहराई में हमको भी खींचो
ये दरिया के किनारे बोलते हैं

कभी दिल भी बुझा रानाइयों पे
ज़ख्म मरहम से जलके बोलते हैं

ज़रा आगोश में भर लो हमें भी
सभी रातों को तारे बोलते हैं

शिकायत जो भी हो हमको बताना
सभी अख़बार वाले बोलते हैं

हमें भी नाम दे दो दिल लगालो
हमें बेनाम सारे बोलते हैं

~ सूफ़ी बेनाम


Sunday, October 16, 2016

आओ गुमनाम..............

पुराने
शरीर के
घिसे-पिटे नाम
स्वस्थ्य स्वय में खोजता
बीमारियों से ग्रस्त बेनाम
अकेलेपन के एक्सपोज़र
असमय-समय के हिसाब
चाहतों के नजुला-जुक़ाम
सपनों की रतौंधी आयाम
किसी के साथ गुज़रे दिन
उम्र के जोड़ों को सहलाते
गठिया ग्रस्त रिश्तों के फ़ाम
खुशगम के द्विद्रुहि-विकार
चर्म रोग के इस्लाम
सांस की खुशबू कर्क रोग
प्यार बना के आया कई
याद के मेन्टल गुलाम
आरोग्य नहीं रोग बनाओ
जीवन को
आओ गुमनाम।

~ सूफ़ी बेनाम



Thursday, October 13, 2016

कागज़ की कश्ती

अस्ल जब सहलाबों से
महासागरों की
गहराई बताता है
तब
बेड़ा जहाज़ बन जाता है
पर
इस विकार से
वो छोटी नदियों, नहरों, नालों
में बह नहीं पता है
कागज़ की कश्तियाँ
हर नज़रिये से बेहतर हैं
नदी के मुहाने से
उल्टा बहकर
बर्फीली पहाड़ियों तक
पहुँचने के लिये
दशा का अस्ल जानना
ज़रूरी है ।

~ सूफ़ी बेनाम


चाँद की ओज

चाँद की
ताज-पोशी से
अविज्ञ-रात का
सिकन्दर परेशान था

सवेरों के यूनान से
काठ के अश्वों पे सवार
आधी दुनिया

एक छत्र कर चुका था लेकिन
हर शाम
खुद चाँदनी की किंकरता
स्वीकार करते हुए
परछाइयों में छिपता
खुद को
अस्तित्व की कंदिराओं में
इंसान के दिलों तले
महफूज़ रखता था

क्षुद्र तारागणों ने भी
तारापति की घोषणा से
स्वीकृति दिखाई थी

व्यग्र व्याकुल बेचैन
सिकन्दर ने
जलदस्युओं के बादल
बटमार स्वप्न-करों,
सूक्ष्म लुटेरों,
पुरुष की वेदना
बेलगाम कवियों की टोलियां
नील के पत्थर
दर्द में टूटे घर
प्रेमप्रवण संगियों
विस्मयी आँधियों
की बड़ी फ़ौज इकठ्ठा की

फिर क्या
खूब युद्ध हुआ ........
तांत्रिकों ने साधा

ब्रह्मवादियों ने माया बताया
कवि-मात्र ने ख्याल से घेरा
आरोग्य-साधकों ने ऊर्जा का स्रोत बनाया

चाँद थक कर छुपा पर
ईद और करवाचौथ ने फिर-फिर ढूंढा
समुद्रों ने लहर भरा वक्ष फुलाया
चाँद को डुबाया
बादलों ने उसे घेर कर चूमा
गोपियों ने कृष्ण को बुलाया
पर
चाँद की ओजपर
कोई ज़ोर न आया
वो निष्कलंक आज़ाद
निशा-ध्वज पर फहराया

निद्रा रहित अँधेरे
स्वप्नों के संशय घरों में
जा छुपे हैं
दिन निकल आया है
शब-ए-बयार है
सिकन्दर के घायलों ने
कम्बलों में मूह छुपाया है

रण-सैय्यम ने
चाँद को घटना बढ़ना सिखाया है

होश में रहता सिकन्दर
तो नाम भी देता तुमको
 बेवक़ती ने तुम्हें चाँद बताया है।

~ सूफ़ी बेनाम


Wednesday, October 12, 2016

वाइल्ड-एलिक्सिर ( wild -elixir)

एसटी-लाउडर के
वाइल्ड-एलिक्सिर की
महक में सराबोर
हिन्दी
अक्सर ही
जब तुम्हारे स्कूटी के
पीछे
ज़बरन चढ़ बैठती है
तो उसे चिढ़ाने के लिये
दायें-बायें, उल्टा-सीधा
चलाती हो तुम
तब
देखा है मैंने कि
हिन्दी चीखकर
लिपट जाती है
कमर से तुम्हारी
करधनी बनकर
और फिर जब
अपने अधरों को
ले भिड़ती है
ज़ुबान
तुम्हारे ब्लाउज की
उजली पीठ की
रेफ पर
तब तुम्हारी रंगीली पाजेब
का एक नुख़्ता
खनक कर
कोहलपुरी को गाड़ी की ब्रेक पर
उर्दू करता है।


माथे पे सजी बिंदियां
साड़ी, टीके, बिछिया, हिजाब
ठोड़ी के तिल
समेत
बिना ट्रैफिक के
एहसासों से
एक्सीडेंट कर पड़ी है।

अचेत कविता तुम्हारी
फिर भी
बेसुध
बुदबुदा रही है
प्यार-महोब्बत की बातें
कहती है
"चले आओ"

~ सूफ़ी बेनाम



और-फिर का एक सूखा पत्ता

और-फिर का एक
सूखा पत्ता,
अब-कैसे की
राह पर चलकर,
खैर-अब के
काँटों पे अटकता,
फिर-कभी के
पंचतंत्र के जाल को ,
खैर-तुम बस तुम्ही रहना
कहकर,
कौन-कहाँ से क्या फ़र्क़ पड़ता है
सोचता हुआ,
जीवन यथार्थ को चूमकर
स्वीकार कर,
मिट्टी में
जा गिरा है
और-फिर का एक
सूखा पत्ता।


~ सूफ़ी बेनाम


रोज़ क्षितिज पे

जब मिलता हूँ तुमसे ,
बेरुखी से यूं मिलता हूँ

कि दयार-ए-ज़िन्दगी
ज़िन्दगी सी होती है

रस्म-ए-निगाह की
दूरियों से ही मिलता हूँ

दौर-ए-दीवानगी
बेहद्द सी होती है

दूरियों में पल रहे हैं
आसमां और ज़मीं भी

पर रोज़ क्षितिज पे
रौशनी सी होती है।

~ सूफ़ी बेनाम


एक रावण - सबका दश्हरा

जो कथा में गुंथा है
सियाराम की .........
जो निहित है मुझमें
रघुनाथ के व्याख्यान से
जो काय के शिल्प से
मेरे रोम-रोम में बसा हुआ
जो निडर है सिया-चेतना
के शाप से
जो भीड़ में अचल
जलने का धैर्य रखता हुआ
वो खुद को बना चुका है
लक्ष्य सबके राम का
है अहंकार, लोभ, मोह, क्रोध,
लोभ, काम, जड़-मायावी
पर ज़रूरी है
राम के संबोध के लिये।

माया की प्रवृत्ति
परस्पर-स्पंदन है
अभौतिक्ता, अध्यात्म का
पूर्ण विराम लगाती है।

बोध-विकास अगर
एक तरफ़ा न हो तो
रामायण के
सम्पूर्ण चक्र से
न राम का आरा टूटता है
न रावण का पहिया
सामाजिक नियमितता
सालाना पर्व मनाकर,
अगले मौसमी बदलाव में
होलिका जलती है।

कुछ तो जलाना है ज़रूरी 
एक पर्व मानाने के लिये।

~ सूफ़ी बेनाम


Sunday, October 9, 2016

इस राह को मंज़िल की आदत न हीं पड़ने दो

उर्दू अदब के बेहतरीन शायर जनाब बशीर बद्र साहब का एक शेर यूँ है.....

पत्थर की निगाह वालों,गम में वो रवानी है
खुद राह बना लेगा, बहता हुआ पानी है

वज़्न - 221 1222 221 1222
अर्कान - मफ़ऊल मुफ़ाईलुन मफ़ऊल मुफ़ाईलुन
बह्र - बह्रे हज़ज मुसम्मन अख़रब मुख़न्नक़

काफ़िया - आनी
रदीफ़ - है

जनाब जनाब बशीर बद्र साहब के मिसरे से गिरह देकर आप सबके साथ, ग़ज़ल में उतरने की कोशिश ....

किस चश्म से निकला है, अब कौन गवाही दे
खुद राह बना लेगा, बहता हुआ पानी है।

बादल से लदे दिन में अब आग लगनी है
इस नर्म से कम्बल की चाहत फरवानी है।

रेती-ले उजाड़ों के हालात बताते थे
गहरे एक सागर में डूब हुआ पानी है।

गर शौक बने जीवन तो राह मुसाफिर पर
कुछ सांस मचल कर के ये उम्र बितानी है।

धीरे से कदम रखना कमरे में अगर आओ
कुछ नींद का कच्चा पन, पायल की रवानी है।

इस राह को मंज़िल की आदत न हीं पड़ने दो
बस हाथ में एक सपना दो चाह दीवानी है।

दो कोस हमें दे दो मीलों के ये सेहरा से
कुछ दूर का वादा है दो सांस निभानी है।

एक लम्स की बस्ती में नवरात नवेली सी
बुझती न ये ख्वाइश है बस आग है पानी है

हर रोज़ सजा करना चाहत के सफ़ीने पर
हर शाम सुलगती सी ग़ज़लों में डुबानी है।

दिन रात परेशां हूँ जीवन न सधा मेरा
बस नींद की बोतल में एक रात सुहानी है।

मुह मोड़ के करवट में सोते है निज़ा करके
बेनाम सिरहानों पर ये रात बितानी है।


~ सूफ़ी बेनाम




Thursday, October 6, 2016

रुके हुए कमरे

रुके हुए कमरों की चार दीवारी में
झांकते हुए दरीचों पे अटकती
उड़ती चिड़ियां
नीली झीलें
बदलते आसमान
बिखरे गुलफ़ाम।

शायद,
पलट कर देखने पर मिलने लगें
बंद दराजों के
अनखुले लिफाफों में बेनाम पैगाम। 

चूने की रंग-रोगन
पे घिसटती हथेलियां
बखान करतीं बचपन के हंगामा। 

सागवान के रेशे लैकर-चढे पलंग पर
बेसुध गद्दों में
कई एहसासों के अर्क ग़ुलाम
नज़र ने सीख लिया है
एकटक टिके रहना निस्तब्धता में
सालों घिसे फ़र्श के मोजैक के उखड़ते टुकड़े
ले लेते हैं फटी एड़ियों से इन्तेक़ाम। 

~ सूफ़ी बेनाम



Saturday, October 1, 2016

भीतर ही भीतर

कौन पढ़ रहा है मुझको
भीतर ही भीतर
गुदगुदा के पनने पलटता है
कौन पढ़ रहा है मुझको
अँगुलियों से
वर्णों की मालाछूता है
कागजों की करवट बदलता है
रोकता है पलटने से
जूड़े की कांटी से
कौन पढ़ रहा है मुझको
महसूस होता है कहींपर
कौन पढ़ रहा है मुझको
भीतर ही भीतर
महसूस होता है
शब्दों की धरा में
धंस सा गया था
हक़ कागजों का कलम से
लिखता गया था
खुद को ज़ाया किया है बहुत
मैंने
माया को कागज़ पे रचकर
कौन पढ़ रहा है मुझको
मेरे भीतर ही भीतर
हर बात जो लिखता था
हर बात जो कहता हूँ
वो सच नहीं
सपना भी नहीं, मगर
अल्फ़ाज़ों के मिलने जुलने से
हालात बदलते थे
सो लिखता था
हर मोड़ नए शब्द
शब्दों से मिलते थे
तो लिखता था
एहसासों का स्वाद है मुझको
सो कहता हूँ
कोई भीतर ही भीतर
पढ़ रहा मुझको
जानता हूँ।


~ सूफ़ी बेनाम






दुप्पटे के नकापोश

एक सीधी लकीर ........
गाड़ियों का हुजूम
अनवरत ज़ारी
कल्पना की स्कूटी
सफारी पे भारी
ज़ूम करके निकलती
दुप्पटे के नकापोश
बन ट्रैफिक विकर्षण
क्या करे बेनाम फरामोश
भच्छ से दे मारी
आगे की गाड़ी
रेंगता हुआ समय
रेंगती धड़कन ........


~ सूफ़ी बेनाम



Thursday, September 29, 2016

सांस के पिंजर फंसे हर आशना एहसान से

डॉ शैलेंद्र उपाध्याय का एक शेर है :

लाख दुश्वारी सही, हर साँस में इक दर्द है
जी रहे हैं लोग फिर भी जिंदगी ये शान से

वज़्न - 2122 2122 2122 212
अर्कान - फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

काफ़िया - आन
रदीफ़ - से
इसमें गिरह दे कर ग़ज़ल में उतरने की एक कोशिश :

गिरह :
टूटता हर मोड़ पे है देख हसरत का फितूर
जी रहे हैं लोग फिर भी जिंदगी ये शान से

मतला :
आज उम्मीदें जगीं हैं हर किसी अनजान से
सांस के पिंजर फंसे हर आशना एहसान से

अश्क़ भीगी रात का चहरा छुपा ले जायेंगे
रश्क़ क्यों इतना करें इक बेज़ुबाँ अरमान से

दिल जले फिर से मिलेंगे उम्र के उस मोड़ पर
इश्क़ को मज़हब बताने हुस्न की पहचान से

कोई ज़िन्दा तो बटोरे स्वपन के आशार को
टूटते हर रोज़ हैं ये हर किसी इंसान से

फलसफा मिलता नहीं अब साथ देने के लिये
सैकड़ों बेनाम मजलिस याद के फरमान से

~ सूफ़ी बेनाम


Wednesday, September 28, 2016

बीज कई परतों में दबाया हुआ है

अब सस्य के समूचेपन को समझो
बीज कई परतों में दबाया हुआ है


रस लदे यौवन का सौंधा-पन उड़ेले
सूखती शाखों पे फल छाया हुआ है


एक प्रकार को सजी बाहरी बनावट
उत्तेजना से उम्र भर ज़ाया हुआ है


बढ़ता आ गया फसल का मौसम
फलों ने दरख़्त को झुकाया हुआ है


न वृक्ष-डाल, न पात-साधना फल
वृक्ष ने नाम फल का पाया हुआ है

चेतना के अनु-कण बीज-धारण
जड़ों का फैलावा माया हुआ है


अब सस्य के समूचेपन को समझो
बीज कई परतों में दबाया हुआ है


सृष्टि में पैदा हुए कई  बेनाम जंगल
तर्क-औचित्य का फल आया हुआ है
~ सूफ़ी बेनाम





Friday, September 23, 2016

कर्म की बही में लिखी संवेदनायें

मेरे अन्तर्मन की निस्तब्धता
बाहरी व्याकुलता के नंगेपन को
अपने मखमली एहसास से
इस तरह ढक जाती है
जैसे खुले ज़ख्म पे भिनकती मखियों से
किसी लोबान्त का उपचार लगाती हैं।

मुसलसल कर्म की बही में लिखी संवेदनायें
आभासों को निस्तब्धता के
उस पार से, धरणी दबी आर सी सी की
राफ्ट फाउंडेशन के भीतर निहित
सत्य की सरिया को टोर से मज़बूत बनाकर
हर होनी हर घटना कर्म को पूर्वनिहित बनाती हैं।

प्रज्ज्वला मस्तिष्क के ठीक भीतर
एक स्थल से प्रफुल्लित हो कर
रीड़ की हड्डियों की इडा-पिंगला को झंकृत कर
सूक्ष्म अणु-निहित चेतनाओं को करके उजागर
कुछ नए दर्पणों को खोलती माया बस
मन-बदन-चेतन-चैतन्य के पात्र बदलती है।


~ सूफ़ी बेनाम



कदम अब बेवफा हैं इस कदर पर

अख़्तर होशियारपुरी का एक शेर है :

परिन्दों से रफ़ाक़त हो गई है
सफर की मुझको आदत हो गई है


इनके सानी मिसरे से गिरह दे कर ग़ज़ल में आगे बहने की कोशिश कर रहा हूँ :


कदम अब बेवफा हैं इस कदर पर
सफर की मुझको आदत हो गई है

मिली है धूल राहों में हमेशा
समुन्दर की वसीयत हो गयी है

फटी एड़ी लहू तर हैं ये धीगें
सफर दिल शौक नफ़रत हो गयी है

कि शायद दौर ऐसा था नहीं पर
नशेमन में बगावत हो गयी है

दबे मोती नदी नाले मिले पर
लहर खार -ए-हकीकत हो गयी है

सहर पर लालिमा फिर से चढ़ी जब
दिनों में कैद ग़फ़लत हो गयी है

रहे कुछ दोस्त बे परवाह से ही
दिल -ए-बेनाम हरकत हो गयी है


~ सूफ़ी बेनाम


Thursday, September 22, 2016

तकिये

कहो !
क्या निस्तब्धता को
आदित्य की अवर्तमानता को
क्या नींद को उकेरने-उभारने ही को
ये रातें बनी हैं ?


कहो !

क्यों कच्ची गरदनों टेकने को,
ख़्वाबों की टूटी श्रृंखला दबाने को
पाहु-पाश के रत्यात्मक एहसासों को
तकियों की ज़रुरत पड़ने लगी है ?



कहो !
बदलकर कब हाड़-मॉस की मुड़ी हुई कोहनियां को
जीवांत पेड़ों के लट्ठों, ईटों चट्टानों को
सूती दायरों में कैद मखमल और कपास के अम्बारों ने
शयन कक्ष में एक तकियायी हासिल की है ?


शायद
विलासता और सुख साधना में धंसकर
मनुष्य जीवी प्राणी उस स्तर पे पहुंचा है कि
समय सारिणी से जीवन बिताता है तकियों पे सोता है
स्वप्न-दर्शी संभावनों को झूठा बताता है।


~ सूफ़ी बेनाम


Sunday, September 18, 2016

सीले तौलियों में सौंधापन पसीने का

सीले तौलियों में सौंधापन पसीने का
कागज़ अपना कोरापन छोड़ कर
हम-सुखन हर्फ़ों से गहरा हुआ
हज़ार बातें सुन कर ब्लैक-बेरी
मोबाइल फ़ोन बहरा हुआ ,
फाइल से झांकते टैग लगी पुर्जियां कागज़,
संतुलित एक सूक्ष्म-शून्य ठहरा हुआ,
बिखरी किताबें, स्पाइरल गुदे ड्राफ्ट्स,
येलो-स्ट्रिप्स पे लिखे काम,
लोगों के नाम,
हज़ार भूलें, गलतियां, नुक्ते , अंगुलियां,
लैपटॉप, प्रिंटर, पेन , पेंसिल, पब्लिशर,
गिफ्ट मिला मफ़लर, अनामिका-तर,
मल्टीविटामिन, त्रिफला,
थालियां, बोतलें, बैग,ज़मीं बिछा गद्दा,
चद्दर , ए.सी., तकिया,
स्टडी की छत से गलतियों को घेरकर
छलांग लगते 2B पेंसिल के एरोस चुभोकर,
री -सायकिलड पेपर्स की गड्डियां
फटे लिफाफों पे लिखी चिट्ठियां,
ब्लड रिपोर्ट्स और जिम में बातें
घण्टों की लाल सफ़ारी ,
सौंदर्य लहरी,
सच तले रुन्दते बेहिसाब झूठों की सिसकियाँ
काक चष्टा, झूठी थालियां,
सब सिमट गए 177 पन्नों के कूचे में बेलगाम
पोइसिस सफ़र पहला कदम बेनाम।


~ सूफ़ी बेनाम





Thursday, September 15, 2016

अस्ल की दूर तक उड़ाने हैं

मतला :
फिर नहीं लौट कभी पायेंगे
पल अगर बीतने दो आयेंगे


नोच निकले अगर सुबह कोई
रात इकसीर हम बनायेंगे


महफिलों में ग़ज़ब अकेलापन
हम नवां रोज़ मिल न पायेंगे


कल तलक इश्क़ के बहाने थे
मुश्क अब किस तरह निभायेंगे


रूज की शाम बज़्म बोसों की
साँस को किस तरह बुझायेंगे


अस्ल है रूह में छुपा गाफिल
बुत बदन तुझसे मिलने आयेंगे


प्यास को इस तरह नफ़ी मत कर
लत-तलब बन हमी सतायेंगे


अस्ल की दूर तक उड़ाने हैं
हम सुखन लिख फलक सजायेंगे


~ सूफ़ी बेनाम

( 2122-1212-22 )



Monday, September 12, 2016

अब वक़्त आ गया है

इस शहर की परत दर-परत उधेड़नी पड़ेगी
घेराबंदी करनी होगी गलियों, बाज़ारों, कूंचों की
कुछ दूर निकल के आना पड़ेगा ज़िन्दगी से
तब क़त्ल-दफ़न, दोस्ती की लाशें मिलेंगी।


ज़मी को ताकते दरख्तों पे लटकते सस्य के
जीन-कोड की बारीकी से जांच करने के लिये
नोच के निकलना होगा छिलके और गूदे को
तब कहीं सुप्त-असल के क्षुद्र बीज मिलेंगे।


विदित नहीं होगा कभी सिर्फ़ सूर्य की रौशनी से
अस्ल, जो जीव आवर्ती पुनरुथान से उलझा हुआ है
मूंद-आखों को वृत्तियों में अहम् का हवन कर
मधु-स्थल में हाथ डालना होगा पीड़ा के चर्म को छूने के लिये ।


अब वक़्त आ गया है।


~ सूफ़ी बेनाम



कवि एकाकी जीव है

कवि एकाकी जीव है,
पटल पर कुछ लोगों का मिलना
दोस्ती हो जाना
सब अनायास था, खुद बा खुद होता गया।
शुरू में उनके अल्फ़ाज़ों की कुलबुलाहट
उनके जस्बातों के दर्पण ....
लगने लगा की सबमें
मैं ही हूँ।
खुद को उनमें देखते-देखते
वाह-वाह करते एक लम्बा अरसा गुज़ारा हमने
कोई मुझे अपने छंदों से बाइस साल का महसूस करवाता
कोई ग्रीष्ममयी जीवन-व्यथा की प्यास मुस्कुराकर बुझाता।
फिर क्या था
ग़ज़ल का दौर चला
छंदों को बहर में बाँधा
और हर ख्याल को मन कानन के अँधेरे में भींच कर कलम किया।
लिखने की हवस बढ़ती रही
मेरे भीतर के इंसान को ढक कर
शायद मैं भी कवि सा हो गया
शायद कहीं कागज़ पे खो गया।
पर आज जगा हूँ
तो खुद को समेटना मुमकिन नहीं है
कुछ हूँ साथ अपने
कुछ दोस्ती में बाँट आया हूँ।

फिर एकाकी हो गया हूँ।


~ सूफ़ी बेनाम



Tuesday, September 6, 2016

मकरंद

जो ख़्याल
ठौर-बदन ढूँढ़ते थे
बे-नब्ज़ बेनाम
किताबों में
अपना इमान रखने लगे।


क्यों कागजों ने सोख  ली
वो स्याही
जो बहकर
पत्तियों में रंग भारती ?
बदकिस्मत !
अल्फ़ाज़ों की गिरह को
सच समझ बैठी।


~ सूफ़ी बेनाम


Wednesday, August 10, 2016

स्वरचित

लिखते-लिखते
शब्दों से खुद
एक जाल सा बन जाता है।
स्वरचित ही
मुझे
फाँस लेता है।
अपना-पन अपने शब्दों में
इतना होता है कि मैं
रोक नहीं पाता इनको।
मात्राओं ,आवाज़ों, अल्फ़ाज़ों में
उलझ सा जाता हूँ
कविता बहाता हूँ।
जाल में फंसे घुन की तरह
उलझता फंसता सांसों को घेरता पिरोता
अंत में मुझे शब्द खा लेते हैं।
बची हुए बेनाम अस्थियों में
कवि कहलाता हूँ।


~ सूफ़ी बेनाम


Sunday, July 24, 2016

ग़ज़ल के फ़ासले पर हैं परेशां

1222-1222-122

हसीं दिल की इनायत और क्या है
मुसाफिर की निस्बत और क्या है

खुदी में रह नहीं सकता परिंदा
खुलेपन की शरारत और क्या है

कफ़स की आड़ में जीना है आसां
बगावत की नसीहत और क्या है

सफ़ीने काठ के होते सभी हैं
लहर की अब ज़िल्लत और क्या है

हिफाज़त को हमारी आ गये गम
बहर गहरी नहीं तो और क्या है

हक्वीकत बन सके तो शाम गुज़रे
अंधेरों की ज़रुरत और क्या है

ग़ज़ल के फ़ासले पर हैं परेशां
कहो बेनाम को लत और क्या है

~ सूफ़ी बेनाम


बहर - ocean, ज़िल्लत - insult, नसीहत - advice, निस्बत - relation / connection




Thursday, July 14, 2016

हे भुजंग-व्यंगकार !

हे देव !
हे सृष्टि में रेंगते हुए
हाड़मांस और सांसों में कुंडलित
मौत के उत्प्रेतक नीतिकार

हे सहज, शिथिल, निर्जीव
प्रतीत होने वाले
स्वर्णमय चर्म में जागृत
कवितामय अंत के रचनाकार

हे सांसों के बल पर
जीव को मंत्र-मोहित कर
बाहु पाश में भरकर समूचा
निगल ध्वंस कर पृथ्वी की जीव ऊर्जा के प्रतिकार

हे जकडाव की कैद को
माँ की कोख, गोद, पालने का वेग
सपनों की गिरफ्त, प्रियसी आलिंगन का कसाव
दारुण कर्तव्यों से मौत के चित्रकार

हे स्वर्ग के दूत
निगलना तो समूचा निगलना मुझे
देखना है आँख खोल कर मौत-तंत्री को फिर भीतर से
अधरों सा मोहक-रासयनिक गुलाबी रंग का नया उदगार
हे भुजंग-व्यंगकार !


~ सूफ़ी बेनाम


 

Thursday, June 30, 2016

जूलिएट का कमरा

अाभूषण, इत्र, चूड़ियां,
खुले संदूकों मे साल तमाम
चप्पलें, रेशम, कंगन,
चेन, रंग, रोगन, रूज़, रूमल, एहतराम
बोर, सिंदूर, संदल, अलत्रक,
साड़ीयां, अंजन, किमाम
मखमली-अंगिया,
रंगे हुए कपास के फाहे गुलफ़ाम
एक लदी  हुई खुली अलमारी
बिस्तर से ड्रेसिंग टेबल तक बिखरे कपड़े गुमनाम
भ्रम, व्याकुलता और अस्वीकृति का समागम
इत्र झुलसे अक्स की लद्दर गुलाम
अईनो पर चिपकी कस्तूरी अांधियों मे
चमकती बिंदियों की चांदनी इकराम
जाफरान गुलाब और खस के  सहलाब मे
बेला के गजरे की बेड़ियों के अंजाम
ऊब जाता हूँ  खुद मे रहता हूँ अगर
सफेद कुर्तों, साफ कागज़ मे हज़ार इल्ज़ाम
कुछ नही है मंज़ूम  ज़िंदगी मे
सादगी है मेरी बेनाम, बस एक खाली नियाम

~ सूफ़ी बेनाम




नियाम - sheath of a weapon, मंज़ूम  - organized, arranged in order, इकराम  -  kindness, honour , गुलफ़ाम - red-coloured, अलत्रक -rose-bengal ,  अंजन - antimony/ surma / eye-shades

Monday, May 23, 2016

क्यों न पत्थर को उछाला जाए

बह्र: 2122 1122 22 (112)

जब तलक दिल पे निशां आ जाए
महफिलों को न सजाया जाए

गम ज़दा हम न रहे एक पल भी
पल को फिर ख़ास बनाया जाए

छेड़ना और नहीं इस दिल को
प्यार का दौर कहीं आ जाए

रात कुछ और गुज़र जाए तो
आग से आग बुझाया जाए

तू रहा खास सभी बातों में
क्यों न हमराज़ बनाया जाए

देख नाकाम रही किसमत भी
क्यों न पत्थर को उछाला जाए

जुल्फ-ए-तहरीर लिखी होती है
ध्यान से पढ़ के बताया जाए

ख्वाब में जिन्दे कई मिलते है
आह इनको न लगाया जाए

~ सूफ़ी बेनाम


सागर

सूक्ष्म की सतह धरे
लहर का विकार है
अंतः अलंकार पर
रतनों का अम्बार है

नौ पर मुझसे मिलना
सतही मुलाक़ात है
अनगिनित जन्तुओं का
कोख में फुलवार है

अनसुनी ताज़गी लेकर
डूबी नदियां अथार हैं
कहते सागर मुझको
इंसान सा आकर है


~ सूफ़ी बेनाम
नौ - boat.


Sunday, May 22, 2016

फलक तक गुमशुदा राहों में यूं ही

1222-1222-122
उलझ कर रह गया ख्यालों में यूं ही
गुंथा था जाने क्यों बालों में यूं ही

शहादत बन चुकी है उसकी चाहत
बड़ी तकलीफ है तारों में यूं ही

कभी तो गिनतियां दीवानो में हो
रहेंगे गुमशुदा यादों में यूं ही

नतीजा बन सकोगे मेरी किस्मत
बसे दिन रात की साँसों में यूं ही

वफ़ा है दिल जलाने का तरीका
सुनो मेरी रज़ा आहों में यूं ही

इनायत बन गयी है तेरी चाहत
सुलगती किस्मतें बाहों में यूं ही

नशा अब बन गया दिल का बवंडर
बहा हूँ शौक से प्यालों में यूं ही

रहा तेरी रिज़ा का ही भरोसा
लगा था इस तरह सालों में यूं ही

ज़रा हमको जगह दो आसमां में
फलक तक गुमशुदा राहों में यूं ही

बहुत सी रौनकें उस पार हैं पर
चलो तो घूम लें खारों में यूं ही

ज़माना देखता कब दिल के आँसू
जिगर तो बन्द था वादों में यूं ही

बहुत संगीन हैं यारी की शर्तें
रहेंगे मौन दीवारों में यूं ही

~ सूफ़ी बेनाम


आवाज़ भी न रेंगी


बुनकर बन गया दिल-जीवन इक ख्याल में
रंगरेज़ निगाहें बेसूद रंग सजाती फलक में
लिखते लिखते अँगुलियों में छाले पड़ गए
औ आवाज़ भी न रेंगी आशिक़-ए-दयार में


~ सूफ़ी बेनाम


देर सवेर

अचरज नहीं तुम बदल गये हो
सारी-बातें मीठे-वादे भी बिसरे हो
देर सवेर भीनी सी यादें में आकर
दिल छूकर भावमय कर देते हो


~ सूफ़ी बेनाम 

Wednesday, May 18, 2016

उमर का अब असर नहीं होता

साथ तेरा कसर नहीं होता
इत्मिना कोइ भर नहीं होता

हम न  चाहें तुमें अगर बन कर
ख्वाइशों का कहर नहीं होता

आबिला पाँव की पहेली थे
दिल से मीलों सफर नहीं होता

हसरतों को ये शौक चहरों का
उमर का अब असर नहीं होता

राह बेउम्र सी मिली अबतक
दासतां का महर नहीं होता

एक नज़्म सी शक़्ल सवालों की
अब कहो की कहर नहीं होता

फिर कभी देर तक मिलेंगे हम
इश्क़ भी हर पहर नहीं होता

साफ़ कह दो कि बंद हैं आंखें
ठोकरें दर बदर नहीं होता

फिर किसी चाँद का सहारा है
रात का अब असर नहीं होता

हम पे स्याही से दाग लगते हैं 
लब पे नेमत कसर नहीं होता


गिरह:
दिन को देखें औ रात फिर सपने
हमसे इतना सफ़र नहीं होता

~ सूफ़ी बेनाम


बह्र :2122 1212 22 (112)
आबिला - boils / blisters , महर - favour



ताज महल

नदी का किनारा
चार बुर्ज,
बीच में गुम्बज,
चढ़ी हुई चौकी
फैले बागान
संग-मरमर की वर्क़
महोब्बत का मकान।

कहो कैसे
खुले खलिहान
पर्वत, नदियां, झरने
सूखे पत्ते, धूप
सूरज चाँद
सेंध लगे मेरे दिल
के निशान
अरमान।

~ सूफ़ी बेनाम



Sunday, May 15, 2016

रहो न रह पाओ तुम कज़ा तक

आइना बस अब तेरी खुशी है
तभी तो किस्मत पुकारती है

कभी कठिन है कभी है आसां
ग़ज़ल की फ़ितरत नयी नयी है

रहो न रह पाओ तुम कज़ा तक
हमें तलातुम सी तिश्नगी है

शबाब ज़ीनत करीब आओ
कि बाढ़ चढ़ती नदी मिली है

तुमारे सहलाब का मैं आशिक़
डुबा जो तुममे तो शायरी है

लबों पे ज्वारा बहक उठा क्यों
पुरानी आदत ये ज़िन्दगी है

~ सूफ़ी बेनाम


Friday, May 13, 2016

जल तरंग

खालीपन पे चोट करें तो
दर्द की वीणा बजती है

खली बर्तन में भी सजते
संगीत की बेला बसती है

अपने अपने खालीपन को
कुछ तो लय में बेहने दो

कर्मों की बही साधने
कलाकार की लाठी बजती है

निःस्तभता में किसी की
अधूरेपन की कविता है

आधे प्यालों की कोरों पे
एक पीर की गूँज बसती है

सुनने वालों सुन के देखो
हम भी रहते खाली हैं

धरती के जल तरंग में देखो
नदी नाले दरिया प्याली हैं


~ सूफी बेनाम




ज़रा आसरा दो दीवाना बना कर

122 -  122 - 122 - 122

कभी तो कहो की कहाँ जा रहे हो
हमें भी बता दो जहाँ जा रहे हो

वफ़ा और मंज़िल इशारा बनी हैं
न जाने सफर ले कहाँ जा रहे हो

ज़रा आसरा दो दीवाना बना कर
जुनूं बेकदर ले कहाँ जा रहे हो

खिसकना अगर है करीबा-भी जाओ
सरकते सरकते कहाँ जा रहे हो

लिखा नाम हमने गुमाँ से मोहब्बत
मिटाते लुटाते कहाँ जा रहे हो

बेनामी बनेगी दिलों की शिकायत
ले आवारगी अब कहाँ जा रहे हो।

~ सूफ़ी बेनाम


यहाँ अधिकार के रिश्ते तो लाइसेंस मिलते हैं

1222-1222-1222-1222

गिरह :
सभी हैं शर्मसारा-ए-गुमां हो ग़र्क़ महफ़िल में
सुना है क्या कि पर्दों में इशारे खुद बिखरते हैं

मतला:
कभी टायर कभी मंज़िल सवारी भी बदलते हैं
सभी सुलझे हुए उस्ताद टपनी से ही बचते हैं

सड़क पर टायरों के घिसटने से पड़ गये ठप्पे
अदब भी तेज़ कारों के जुनूं के किस्से बुनते हैं

कभी रफ़्तार उलझाती रही मासूम चाहत को
कहीं पर ब्रेक के बेफ़िक़्र से बिगड़े उछलते हैं

खबर रखते हैं सडकों पर सभी के आने जाने की
मसाफत में ज़मी औ आसमां भी नपते दिखते हैं

रुकोगे गर कहीं तुम बेवजह, संभलने को ज़रा भी
नियम बिगड़ा बड़ा है ये यहाँ चालान कटते हैं

बिना अभ्यास के इस दौर में कोई नहीं चलता
यहाँ अधिकार के रिश्ते तो लाइसेंस मिलते हैं

गुनाह -ए-कार ही होता इसे पेट्रोल ना भरते
सज़ा हैं दूरियां भी इसलिए नक़्शे भी मिलते हैं

बड़ी गति से निकलते हैं डगर पे लौह के पैकर
सफर बेनाम चलते हादसे होते ही रहते हैं।

~ सूफ़ी बेनाम

मसाफत - distance , space , days  journey; टपनी - stepney
( tired of writing on Love , Pain and Passion I have used the imagery of car for some play of feelings and to establish the strange correlation with life.)


Tuesday, May 10, 2016

पंखों को सुलझाकर थोड़ा सिमटो मुझसे प्यार करो

डूबी शामों के साये अब शाखों पे चढ़ बैठे है
सूने हैं अब जंगल सारी बातों का विस्तार करो

आहिस्ता से आकर डाली को अपने पंजों से कसकर
पंखों को सुलझाकर थोड़ा सिमटो  मुझसे प्यार करो

चंचु चंचु छेड़ो फिर से कलरव क्रुंदन कोलाहल में तुम
रातों की गहरी चुप्पी को रोको तो इकरार करो

आकाशों के आगोश रहकर क्या मंज़र भर लाये
धरती पे दाने बिखरे क्यों उड़े अब विस्तार करो

देखो कैसा ढलता सूरज बहका बहका दिखता है
अम्बर की मदहोशी को ओढ़ो डैने खुमार करो

~ सूफ़ी बेनाम