Tuesday, May 3, 2016

पूर्वनियत संसार

प्रेम-रस उदगार का कोई धरातल
ढूंढने पे भी नहीं मिलता जगत को
मूँद आँखें सूने मन मधु-कोष भरता
चैन की दो सांसों से  दुश्वार दो पल
रूक सको कुछ देर तो बैठो यहीं पर
देख लो नर्गिस का ये विजन-वैभव
सांस लेते उद्यान में खोये हुए क्षण
आह भरती तितलियों के रंगीन पर
साथ को चट्टान का ही ठौर रखलो
सोच को खोये हुए मन का सहारा
प्यार है नहीं अभिशाप समझो
दर्द भरी बहती कश्ती को किनारा
बीत चुके है दिन औ ये मास भी अब
प्रारब्ध गुदे रास्ते समय दिखारा
पूर्वनियत संसार को है रोज़ जीता
खोल कवि,  कविता का पिटारा  
~ सूफ़ी बेनाम


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