Saturday, September 14, 2013

बाघा जतिन

हम एक बाघ का शिकार करके
उसकी खाल उतार कर ले तो आये
पर उसकी दहाड़ को समेट न पाये
ना ही दिखा सके वो रंजिश, न जस्बा
जिसपे हम मिटे थे जुनून बनकर।

वो जंगल भी तो अब नाराज़ से हैं
यहाँ कमी है उस खूं-रेज़ी की
उससे जीवन-जान का तक़वा था
न रहा बाघ तो हिरन भी जाते रहे
धूप और सायों के कफन से रह गये।

ख़त्म  इन मचानों का बंदूकों का वजूद
उस शिकारगाह में जलसे भी क्यूं होंगे
क्यूं कोई बेबस, प्यासे, बे-इख़्तियार नाखून
उस रंजिशी-रिश्ते में अपने हिस्से पर
नफ्स के निशां छोडेंगे।

मुझे ख्वाइश न थी सिर्फ खाल की
इससे ढकी धड़कने,वो जस्बा, वो रंजिश
वो आरज़ू - सबकी ज़रुरत है
इन रिश्तॊ के जंगल में इस फिरदौसी दुश्मनी को
मै फिर से जीना चाहता हूँ, इस बार कुछ ज्यादा।

~ सूफी बेनाम



खूं-रेज़ी - fierceness; तक़वा - balance;

This is a small dig into the skin of relationships that we live. Bagha Jatin - a historic figure in Indian freedom Struggle, killed a tiger when he was sixteen. The fierceness of his combat cannot be understood by just facts. It got concluded in a title. So are our relationships. The primordial reason that brings a relationship into existence is often lost, leaving names and facts.

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