Friday, March 4, 2016

चलते हैं हम तुम पे अब भी रास्तों

चाह थी बेनाम मेरी रास्तों
ज़ख्म ज़िन्दा के निशां पे रास्तों

शुक्र कर कि दौर जंगल के खड़े
चलते हैं हम तुम पे अब भी रास्तों

इब्तिदा फिर शौक गर तेरी बने
धीग में तुम फाँस करना रास्तों

रुकना ना नहीं मंज़िलें हैं वारिसां
उनसे है छू कर गुज़ारना रास्तों

राह गुज़र ख़ाक में तेरी मिले
हमको न शौक करना रास्तों

अजनबी जब दोस्तियां करने लगे
वो हसीं फिर मोड़ लाना रास्तों
~ सूफी बेनाम


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