Thursday, February 25, 2016

राह का मजमूँ समझेगा क्या

राह का मजमूँ समझेगा क्या
क्या कभी खुद से भी सुलझेगा क्या

दिन में हारा खुदी से था इन्सां
रात भर अब शर्त पे बदेगा क्या

दिल में जलती हुई नफ़स रख कर
राज़ फिर शौक कोई बनेगा क्या

खुद से मिल कर सफर में वीरां पर
राह भर तुझसे फिर बचेगा क्या

बह गयी शाम मय के प्यालों पर
होश का पैर ठहर सकेगा क्या

खुद से हारा है बारहा लेकिन
शर्त अब चीज़ तू बदेगा क्या

पास आ छू रही नज़ा अब क्या
जन्म दर जन्म प्यार करेगा क्या
~ सूफ़ी बेनाम



नज़ा  - last breath

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