Wednesday, May 8, 2013

सब्र

कहीं है अस्मां सहमा
काली धुंध से घिर कर
बिछा बारूद सा आशिक
छिड़क कर आग सांसों की
चला है रू-ब-रू होने
किसी मौला की मजलिस में
कफन कर चलो इसको
दफन कर चलो इसको
छुए न किसी भी खता से
लपट की सांस भूले से
जगे न फिर मुहब्बत में
मुजल्ला बारूद नशे में चूर।



फ़कत है बात बस इतनी
तुमने कई बार कोशिश की
बुझी ना आग, पानी से
ना ही थी आस दिल में सधि,
दारू-ए-बंदूक जब सीने में।
क्यूं बेमंज़िल सा है यूं पड़ा
सिमट के आज गोले में?
लपट-बारूद तदसुन से
क्यों न लुक्वाल बारिश हो
धधक के अस्मां बहके
झुलस कर आज तुम सुन लो
सिसक इन आग शोलों की
धुआं भी शून्य तक उठकर
परिंदों की परवाज़ को छू ले
समा कुछ और पहले हो
सफा कुछ तो अब बदले।



बेकरारी आज होने की
लपट से आज सीने की
रुका बारूद बस सुन कर
तुम्हारी आह! सपनों पर
बड़ा बेमर्म होना है
तहम्मुल इम्तेहां है ये
इन्हीं कुछ शोख रिश्तों का
बिना अंजाम तक पहुंचे
निरे बारूद ही रह गए।
झुलस के तुम नहीं जीते
बरसती आग शोलों से
सजो तुम गुल की चाहत से
बस यह ही दुआ मेरी।



पिए जब शाम मस्ती में
खिला जब यारां ! यारां ! हो
झुका इमान सजदा कर
दहक ना आग शोलों की
हो बारूद की किस्मत में।
बिखर कर ज़िन्दगी देती
खिली जो तपिश बसेरों में
दहक बारूद की उसमे
भरे धमाक होने की
वहां कोई नहीं जीता
दहक तो ताप देती है
उसी से ज़िन्दगानी है
कुछ हमसे दूर बस है व़ोह
दमकता आफताब है व़ोह

~ सूफी बेनाम





meanings

मुजल्ला - चमकदार - shining ; तहम्मुल - internal burden - forbearance - patience ; शोख - शरारती naughty ; आफताब - सूर्य sun ; सफा - purity; लुक्वाल- conflagration

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