Monday, December 12, 2016

नक़ाब

मेरे नक़ाब को अपनी आँखे चुभाने वाले
कभी मुझे छू के महसूस तो किया होता
ज़िन्दा वो झूठ भी हैं जो राज़ बने रहते हैं
माँस ये चेहरे को महसूस तो किया होता
लाल लहू उतना ही है नकाब का जितना
असल के चहरों ने था हर रोज़ पिया होता
काश तू उन से अलग होता उनसे जिनने
सच के वास्ते सौ झूठ क़त्ल किया होता।

~ सूफ़ी बेनाम


वरदा

खैरियत बंदिशों में है तब तक
बह्र तूफ़ां जगा रही जब तक

आसरे जो रहा हवाओं के
वो सफीना नहीं मिला अब तक

दरमियां आप भी पहेली भी
नज़र तूफ़ां से जा मिली तब तक

डूबना इश्क़ में बेमानी था
मिल रही चाह गर हो मतलब तक

टूटने लग गये सभी अपने
आरज़ू हो गयी नफ़ी लब तक

मौत दो चार की हुई जिनको
घर नहीं शहर दे सका अब तक

छूट कर ज़ुल्फ़ से गिरा वरदा
आज तो खैरियत रहे शब तक।
or
छूट कर ज़ुल्फ़ से गिरा वरदा
आब -ओ -गिल अमन रहे शब तक।

~ सूफ़ी बेनाम

2122 1212 22 / 112

वरदा - red rose, बह्र - meter in poetry /ocean, सफीना - boat, नफ़ी - forbidden, denial, आब -ओ -गिल - water and earth - elements of nature


ख्वाइशों के डोडे

अब
अतीत का शोर
वर्तमानी-दरीचों के
पारभासी काँच से भरे
नाज़ुक दिलहों पर
दस्तक़ नहीं करता ।
 
न ही
भविष्य की अफवाहें
कुरेदती हैं उम्मीद के
फाहों से
आज के नाखूनों में
गुदे हिसाब-क़िताब।
व्यग्र-उद्वेग वासना भी
अपनी बेमियादी
की घोषणा
बदन की सतह पर
करके
धमनियों में प्रवाहित
होने के लिये
एक स्पर्श के आभाव से
शेर दर शेर
ग़ज़लों में
जमने लगी हैं।
मौसम सर्द गर्म
और बारिश के सिवा
अब कुछ भी नहीं।
मुराद-ए-वस्ल
जगती है
दिखती हैं
मज़ाक बनती हैं
ग़ुज़र जाती हैं।
नर्म तकिये भी
ख्वाइशों के डोडों से फूट-कर
सेमल से  
रेशमी नकाब चढे
कुछ बीज
ले उड़े हैं।

तुम सुनाओ .........
क्या ये बीज
तुम्हारी ख्वाइशों के
फ़ित्ना-गर गिल की
नमी पे
अंकुर तो नहीं
छोड़ बैठे हैं ?

~ सूफ़ी बेनाम


Saturday, December 3, 2016

ख़्वाब खुद नहीं चल पाते कभी

वज़्न - 2122 2122 212
अर्कान - फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
बह्र - बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ
क़ाफ़िया - आया
रदीफ़ - देर तक
मशहूर शायर आदरणीय नवाज़ देवबंदी जी के मिसरे में गिरह दे कर ग़ज़ल में उतरने की कोशिश :

मोड़ वीराने पे रुकना हमसफ़र
धूप रहती है न साया देर तक

मतला :
ख्वाब का दर खटखटाया देर तक
रात ने हमको नचाया देर तक

करवटों में पल रहे थे सपने जो
अदब का मतलब सिखाया देर तक

आस एक सोकी थी सिरहाने ने यूं
पास रहकर दिल जलाया देर तक

सच चुभा करते नहीं पैरों में जो
झूठ बन कर फिर रुलाया देर तक

साँस जब भी आशना मिलती नहीं
अखतरों ने टिमटिमाया देर तक

ख़्वाब खुद नहीं चल पाते कभी
रात कर्ज़ों को चुकाया देर तक

साथ तेरा फिर पहेली था बना
महज़ एक वादा निभाया देर तक

~ सूफ़ी बेनाम 
















Wednesday, November 30, 2016

हर कश-ए-राख पालता है मुझे


वज़्न - 2122 1212 22 / 112
अर्कान - फाइलातुन मुफ़ाईलुन फैलुन
बह्र - बह्रे खफी़फ मुसद्दस मख्बून
काफ़िया - अता
रदीफ़ - है मुझे

बेकल उत्साही साहब का एक शेर है :
"होने देता नही उदास कभी
क्या कहूँ कितना चाहता है मुझे"

उसके सानी मिसरे पे गिरह देते हुए ग़ज़ल में उतरने की कोशिश :

गिरह :
जल गया दो कशों की ज़हमत पर
क्या कहूँ कितना चाहता है मुझेै

मतला :
ज़िक्र उसका इरादता है मुझे
आदते-ए-शौक़ मारता है मुझे

साँस की दो खलिश पे ज़िन्दा जो
आशिया का नशा अता है मुझे

ग़र्क़ ख्वाइश, धुंआ नसीबों का
ऐश-टरों में बिखेरता है मुझे

चाहतें कुछ सुलगती हैं अक्सर
हर कश-ए-राख पालता है मुझे

मयकशां यार की सुहूलत हूँ
बेतकल्लुफ़ क्यूँ मानता है मुझे !

जो रिहा है धुओं के छल्लों में
हमसुख़न साज़ मानता है मुझे

सिगरटें चाय की दुकानों पर
गुज़रता वक़्त जानता है मुझे

गर्त कोई हवा की भर कर वो
लब-नशीनी से साधता है मुझे

शायरा-शौक और बेनामी !
बदहवास खूब खींचता है मुझे

~ सूफ़ी बेनाम



Friday, November 25, 2016

थोड़ा गोलाई से

चट्टान को चट्टान की 
नोकीली पेचीदा
चढ़ाई पर धकेलना
वैसे ही है जैसे
ढलती हुई उम्र में
मोहब्बत निभाना 
और जैसे
सांसों के दरमियाँ ज़िंदा से
ज़िन्दगी समझना समझाना।

चट्टान को चट्टान की
चढ़ाई पर धकेलना
संभव है मगर 
आलिम कहते है
थोड़ा गोलाई से 
हौले-हौले।

~ सूफ़ी बेनाम


Thursday, November 17, 2016

कौन समझे ये काफ़िरी क्या है

वज़्न - 2122 1212 22 / 112
अर्कान - फाइलातुन मुफ़ाईलुन फैलुन
बह्र - बह्रे खफी़फ मुसद्दस मख्बून
काफ़िया - ई ( स्वर ); रदीफ़ - क्या है
मिसरा....
"हमसे पूछो कि खुदकुशी क्या है"

गिरह :
महज़ सांसों में ज़िन्दगी क्या है
हम से पूछो कि खुदकुशी क्या है

मतला :
हसरतें इस कदर दबी क्या है
दिल न टूटा तो आदमी क्या है

ख़्याल की ख़्याल पर मीनारें सौ
अब पता क्या कि आखिरी क्या है

काफिये काम अब नहीं आते
बे-बहर नज़्म फिर सजी क्या है

फूस की छत तले जो ज़िन्दा थे
उनसे पूछो कि मौसकी क्या है

शायरी काम हैं अदीबों का
कौन समझे ये काफ़िरी क्या है

नफ़रतें दासतां बनी अक्सर
इश्क़ में खोई ज़िन्दगी क्या है

कोई तिनका हवा से पूछे तो
आज फिर सज के वो चली क्या है

ग़र्क़ चाहत पे और नफ़रत पे
कौन जाने ये मुद्दयी क्या है

फैसले इस तरह बढ़ायेंगे
आसमाँ और ये ज़मी क्या है

आज बेनाम को नहीं रोको
खुद समझने दो दिल्लगी क्या है

~ सूफ़ी बेनाम