Wednesday, April 24, 2013

मुक़ाम

इस धुँएं में महफूज़ हैं
कि बहुत शिद्दत से थे हम जिए .
वीरानों में झुलस कर
ख्वाबों  को हम रोज़ सजदा करते हैं .

इस धुँएं में महफूज़ हैं
हर वो शाम थे जिस पर गम सजे .
महक इबादत में उठती है
लपटों से लिपटकर खिला करती है.

इस धुँएं में महफूज़ हैं
कि बहुत शिद्दत से थे हम जिए .....

बेख़ौफ़ बढता चल रहा था
शोलों पर यह कारवां.
बेफिक्र सहर पर बिछी है
राख इसकी ऐ बेखबर.

एक अनकही टीस है
उससे सुलगकर लिपटकर
बेनाम नाबालिग-मोहब्बत
हर शाम यहाँ एक क़र्ज़ अदा करती है.

इस धुँएं में महफूज़ हैं
महक हर उस नक्श की
जो गुलिस्तान की ख़िलाफ़त में थे खड़े,
घडी गुज़र जाने के बाद.

इस धुँएं में महफूज़ हैं
कि बहुत शिद्दत से थे हम जिए ....

~ सूफी बेनाम


दर्द


वोह दर्द ही क्या जो स्याही मे बहे
जो बेलकीर किताबों पर अंगुलिओं से कलेमा कहे 
जो शब्दों के जाल बुन कर अँगारों सा सुल्गे
जो रिसती हुई दलीलों को वजाहत से सहे  
जो तसव्वुफ़ -इ-आतिश को आस समझे 
दर्द वो है जो सीने में चुभो के रखते है 
जो की एक बेपर्वाह नशीली आरज़ू के किनारे 
इक खामोश सौदा करते हैं 
और धीरे-धीरे रिसता है .

~ सूफी बेनाम

दस्तक



कई रातें बीताई, किसी टूटे सिरे
को ढूँढने की मजबूरी में
फिर मुझे यह लगता था
सपनो से रिश्ता टूट गया है.

अचानक, रात मुझे एहसास हुआ
अकेला कोई मशरूफ है जो मुझे जगाता है
उन अनजानी दूरियों से
कोई बेनाम मुझे बुलाता है.

सुबह के उजाले के निकट
जब लहु-मय से प्याले लदते हैं
तो दिल के अन्दर से दस्तक दे
कोई कुछ कहने को आता है .

इंसानी समझ की पैमाइश से अलग
उसकी अपनी भाषा है
मै ठीक से सुन नहीं पता
कुछ  ठीक से कह नहीं पता .

~ सूफी बेनाम





महामाया मार्ग



घर से चले रास्ता मिला,
आगे चले दोराहा मिला
फिर तिराहा और आगे चौराहा.

कतार दर कतार लोग चल रहे हैं
मूक, उसूलों की कमान पर
जब भी अपनी मन की करो,
उल्लंघन करो तो
चोट लग जाती है.
कहते  हैं आगे एक्स्प्रेस्स्वय मिले गा
वहां गाड़ियाँ खुद ब खुद चलती हैं
वह महामाया मार्ग है....


मै और तुम


तुम दस्तूर ही न समझे जीवन का
और अपने सुरूर में हम,
मूड- पाखंडी, भ्रामक- अचेत
अहम् - घमंड की मूरत,
पर हम दोनों हैं वहीँ खड़े.

मनोव्यथ-चेतन, वैवेकिक-चिंतन मन में
हम दावे के साथ जागरूक-सचेत हैं
तुम सोचा ही नहीं करते
तुम बेफिक्र निरुद्देश्य मंडराते जीव-मधु की लहरों पर,
पर हम दोनों हैं वहीँ खड़े.

है उमड़ धड़क घबराहट बैचैनी
मै अंतर्मन अकुलाई .
तुम पाशविक-जीव, अमिश्रित -स्वच्छ
जीवन में हो धीर धरे
पर हम दोनों हैं वहीँ खड़े.

इस शारीर-तीर-धनुष से हम
कब मीन-चक्षु को भेदेंगे
और भेदन विजयी हो क्या द्रौपदी पा जायेंगे
इस भ्रम-निहित, अशक्त-अर्जुन हम
हैं हम दोनों हैं वहीँ खड़े.

~ सूफी बेनाम 






मै जीया वही जो बीत गया



यह जो राख समझकर- उड़ाकर कर तुम हाथ धोते हो ?
वोह आज भी हमारी रातें खरीदने का आज़र रखती है .

2012 को मेरा सालम ...

~ सूफी बेनाम


नासिरा



एक उम्र का  फासला, 
कुछ अनकहे वादे,
ये फर्जी  दूरियाँ, 
कई  फ़तवे बेनाम  । 

एक वो मुखालिफ 
कुछ मुखबिर नज़रें,
ये  रुहानी मह्बस, 
कई मुख़्तार बेअदब ।

एक रिश्ता अधूरा,
कुछ नए ख्वाब , 
ये सुबह की खुमारी,
कई  किरदार बेफिक्र ।

एक कुतुबखाना 
कुछ नाचार कागज़ात 
ये अल्फाज़ों का ज़हर 
कई ख्वाइशें बेसुध।

एक तुम   
कुछ हम 
ये  नासिरा 
कई लम्हे बेबस ।

~ सूफी बेनाम 

किरदार - character ;कुतुबखाना - library ; नाचार - helpless; नासिरा - lie, मिथ्या, falsehood ;मुखालिफ - revolting ;मुख़्तार - free to roam; मह्बस  - jail.