Wednesday, January 18, 2017

हमें माथे की वो बिन्दी बनाकर

वज़्न - 1222 1222 122
अर्कान - मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फऊलुन
बह्र - बह्रे हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़
काफ़िया - आना
रदीफ़ - जानता है

मतला :
सदा पागल ज़माना जानता है
मुहब्बत की हक़ीक़त जानता है

ज़रा अंगुली को तुम बंदी बना लो
खुली ज़ुल्फें फसाना जानता है

हमें माथे की वो बिन्दी बनाकर
रस्म दिल की निभाना जानता है

निशानी शीर पे बनता नहीं जब
बना झुमका झुलाना जानता है

हमें खोंसा रहा उसने कमर में
वो अंगुली से नचाना जानता है

कभी बिछिया सजी पायल पहनकर
ग़ुलामी भी कराना जानता है

हमें मंज़ूर है उसकी हिरासत
जो हमको गुनगुनाना जानता है

~ सूफ़ी बेनाम



जिस्म है प्यास से लदी रिक़्क़त

वज़्न 2122--1212—22 / (112)
अर्कान-- फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
काफ़िया— आ
रदीफ़ --- देना

ज़िन्दगी की हमें दुआ देना
हो सकेगा हमें भुला देना ?

आस टूटी नहीं कभी तुम से
मत करीबी का मरहला देना

ढूंढ कर रोज़ की ख़ुशी हम में
प्यार को प्यार की सज़ा देना

जिस्म है प्यास से लदी रिक़्क़त
खुरदुरापन मेरा मिटा देना

नाज़ से तिशनयी बदन पर लब
रात का सिलसिला बना देना

जब भी मिलना हमें तो नौ बनकर
ज़िन्दगी शौक से अदा देना।

~ सूफ़ी बेनाम


Tuesday, January 17, 2017

अंगुलियाँ

इन्तेज़ारी सदी के बाद
हवा में है आवाज़ तुम्हारी
जिस्म की खरखराहट
उम्र को रेशमी कर गयी है
ग़ज़ल लब से नहीं
अँगुलियों से बोलती है
हकीकत की बेयक़ीनी में
हमने भी कान
अपनी हथेलियों पे ले रक्खे हैं
आवाज़ें, कवितायेँ और 
वस्ल
नाखूनों के कुरेदने से
मेरी लकीरों की गलियों में
घर ढूँढ़ते हैं
चाय की चुस्कियाँ जो घुल गयी थीं
नर्मदा की लहरों में
आज दिल्ली में धूप बन कर
बोलती हैं
तुम वो साया हो कि जिसके सच में
मेरी बेनामी के झूठ
पनपने लगे हैं
फिर से कौंधना
अलफ़ाज़ बनकर।

~ सूफ़ी बेनाम 







Sunday, January 15, 2017

निगाह -ए-कलम से हमें अब तराशो

हमारी अदीब शायरा पूजा कनुप्रिया जी के मिसरे में गिरह दे कर ग़ज़ल की कोशिश
122 122 122 122
अरकान,,
फ़ऊलुन, फ़ऊलुन ,फ़ऊलुन , फ़ऊलुन
काफ़िया.... ख़तावार(आर )
रदीफ. = तुम भी

गिरह:
शराफत बनी रात में वो क़यामत
ख़तावार मैं भी, ख़तावार तुम भी

मतला:
इरादे वस्ल के खतवार तुम भी
न चाहत न सिलवट हो क्या यार तुम भी

जला दो मिटा दो ज़रा आग देकर
ये मुर्दा खलिश है औऱ आसार तुम भी

चिपकने लगी गर्द ख्वाइश से आँखें
जला सा हूँ मैं और अंगार तुम भी

ये समझो फ़िज़ा में गुज़रता समय है
बिता कर ग़ुज़ारो हो दरकार तुम भी

निगाह -ए-कलम से हमें अब तराशो
गुनाह -ए-मोहब्बत के फनकार तुम भी

अइंदा किसी दौर में तुम न मिलना
अगर हो नहीं आज रुखसार तुम भी

~ सूफ़ी बेनाम









Friday, December 30, 2016

दिल फ़रेब उम्र पैतालीस की

बड़ा ही जीवट वो
एक नन्हा बच्चा
जिसको सज़ा-ए-नीलडाउन में
नाचते हुए देख कर
हम अपने भीतर के
निःस्तब्ध बचपन को
खंरोचते थे
चाहते थे कि
कहीं तो मेरे अंदर
कुछ हलचल हो
और उस सा चंचल
हो जाऊं
मेरा दोस्त था वो


एक नन्हा बच्चा
जिसे मैं बचपन से जानता था
जीवन की दिल फरेबी से
उम्र पैतालिस में
उसी क़ुएसचन- पेपर
की तरह रुस के वैसे ही
जा छुपा है जैसे
बचपन में बेजवाब सवालों
से लदे प्रशन पत्र
हमारी नासमझी
हमारी नक़ाबीलियत का प्रमाण
रिपोर्ट कार्ड में
खोल खोल देते थे।
मेरा दोस्त था वो .................


~ सूफ़ी बेनाम

नीलडाउन - kneel-down ; 

Remembering Anil Bhatia ( a class mate from St. Aloysius), who left us all of a sudden, unannounced at 45. 





Thursday, December 22, 2016

काश हद खुद की हम सिए होते



अब्दुल हमीद अदम के एक मिसरे में गिरह देकर ग़ज़ल में उतरने की कोशिश :
वज़्न - 2122 1212 22 / 112
अर्कान - फाइलातुन मुफ़ाईलुन फैलुन
बह्र - बह्रे खफी़फ मुसद्दस मख्बून
काफ़िया - ए (स्वर)
रदीफ़ - होते

गिरह :
आस भर कर उफन उठी लहरें
काश थोड़ी सी हम पिए होते

मतला :
दिल शिकन चार तो दिए होते
दर्द ले साथ हम जिए होते

वक़्त वीरान सी पहेली है
गुफ़्तगू आप ही किए होते

आशना आप और पहेली भी
सांस पे सांस से गुदे होते

छू सके गर नहीं तुम्हे लब से
अक्स को चूम कर जिए होते

राज़दां दिलबरी रही तुम से
काश हद खुद की हम सिए होते

करवटें आप तक न दें पहुंचा
ख़्वाब निगरान तो किए होते

तापते रह गये दिल-ए-ज़ीनत
सर्द बेनाम ही जले होते

~ सूफ़ी बेनाम







Monday, December 12, 2016

जो नहीं जानते मज़हब की दवा देते हैं

जनाब साहिर लुधियानवी साहब के मिसरे में गिरह दे कर ग़ज़ल में उतरने की कोशिश
गिरह :

इश्क़ की आह पे पीता गया तम का प्याला
आप अब शौक से दे लें जो सज़ा देते हैं

मतला :

जीते वो ही हैं जो हर दिन को जला देते हैं
खोजते नौ को हैं यादों को सुला देते हैं

रात अब तलक नहीं भूल सकी वो हसरत
ख्वाब रातों को यूं मखमल की सज़ा देते हैं

प्यास की स्याह तलब और नफ़ी की आदत
जो नहीं जानते मज़हब की दवा देते हैं

भूल कर आप का घर राह की मंज़िल पे हम
गोया परछाई हक़ीक़त में मिला देते हैं

हम भी बेनाम रहे यूं कि दिलों के प्याले
अश्क़ में अस्ल को हर रोज़ जगा देते हैं

~ सूफ़ी बेनाम


-- 2122 1122 1122 22/112