Wednesday, October 12, 2016

और-फिर का एक सूखा पत्ता

और-फिर का एक
सूखा पत्ता,
अब-कैसे की
राह पर चलकर,
खैर-अब के
काँटों पे अटकता,
फिर-कभी के
पंचतंत्र के जाल को ,
खैर-तुम बस तुम्ही रहना
कहकर,
कौन-कहाँ से क्या फ़र्क़ पड़ता है
सोचता हुआ,
जीवन यथार्थ को चूमकर
स्वीकार कर,
मिट्टी में
जा गिरा है
और-फिर का एक
सूखा पत्ता।


~ सूफ़ी बेनाम


रोज़ क्षितिज पे

जब मिलता हूँ तुमसे ,
बेरुखी से यूं मिलता हूँ

कि दयार-ए-ज़िन्दगी
ज़िन्दगी सी होती है

रस्म-ए-निगाह की
दूरियों से ही मिलता हूँ

दौर-ए-दीवानगी
बेहद्द सी होती है

दूरियों में पल रहे हैं
आसमां और ज़मीं भी

पर रोज़ क्षितिज पे
रौशनी सी होती है।

~ सूफ़ी बेनाम


एक रावण - सबका दश्हरा

जो कथा में गुंथा है
सियाराम की .........
जो निहित है मुझमें
रघुनाथ के व्याख्यान से
जो काय के शिल्प से
मेरे रोम-रोम में बसा हुआ
जो निडर है सिया-चेतना
के शाप से
जो भीड़ में अचल
जलने का धैर्य रखता हुआ
वो खुद को बना चुका है
लक्ष्य सबके राम का
है अहंकार, लोभ, मोह, क्रोध,
लोभ, काम, जड़-मायावी
पर ज़रूरी है
राम के संबोध के लिये।

माया की प्रवृत्ति
परस्पर-स्पंदन है
अभौतिक्ता, अध्यात्म का
पूर्ण विराम लगाती है।

बोध-विकास अगर
एक तरफ़ा न हो तो
रामायण के
सम्पूर्ण चक्र से
न राम का आरा टूटता है
न रावण का पहिया
सामाजिक नियमितता
सालाना पर्व मनाकर,
अगले मौसमी बदलाव में
होलिका जलती है।

कुछ तो जलाना है ज़रूरी 
एक पर्व मानाने के लिये।

~ सूफ़ी बेनाम


Sunday, October 9, 2016

इस राह को मंज़िल की आदत न हीं पड़ने दो

उर्दू अदब के बेहतरीन शायर जनाब बशीर बद्र साहब का एक शेर यूँ है.....

पत्थर की निगाह वालों,गम में वो रवानी है
खुद राह बना लेगा, बहता हुआ पानी है

वज़्न - 221 1222 221 1222
अर्कान - मफ़ऊल मुफ़ाईलुन मफ़ऊल मुफ़ाईलुन
बह्र - बह्रे हज़ज मुसम्मन अख़रब मुख़न्नक़

काफ़िया - आनी
रदीफ़ - है

जनाब जनाब बशीर बद्र साहब के मिसरे से गिरह देकर आप सबके साथ, ग़ज़ल में उतरने की कोशिश ....

किस चश्म से निकला है, अब कौन गवाही दे
खुद राह बना लेगा, बहता हुआ पानी है।

बादल से लदे दिन में अब आग लगनी है
इस नर्म से कम्बल की चाहत फरवानी है।

रेती-ले उजाड़ों के हालात बताते थे
गहरे एक सागर में डूब हुआ पानी है।

गर शौक बने जीवन तो राह मुसाफिर पर
कुछ सांस मचल कर के ये उम्र बितानी है।

धीरे से कदम रखना कमरे में अगर आओ
कुछ नींद का कच्चा पन, पायल की रवानी है।

इस राह को मंज़िल की आदत न हीं पड़ने दो
बस हाथ में एक सपना दो चाह दीवानी है।

दो कोस हमें दे दो मीलों के ये सेहरा से
कुछ दूर का वादा है दो सांस निभानी है।

एक लम्स की बस्ती में नवरात नवेली सी
बुझती न ये ख्वाइश है बस आग है पानी है

हर रोज़ सजा करना चाहत के सफ़ीने पर
हर शाम सुलगती सी ग़ज़लों में डुबानी है।

दिन रात परेशां हूँ जीवन न सधा मेरा
बस नींद की बोतल में एक रात सुहानी है।

मुह मोड़ के करवट में सोते है निज़ा करके
बेनाम सिरहानों पर ये रात बितानी है।


~ सूफ़ी बेनाम




Thursday, October 6, 2016

रुके हुए कमरे

रुके हुए कमरों की चार दीवारी में
झांकते हुए दरीचों पे अटकती
उड़ती चिड़ियां
नीली झीलें
बदलते आसमान
बिखरे गुलफ़ाम।

शायद,
पलट कर देखने पर मिलने लगें
बंद दराजों के
अनखुले लिफाफों में बेनाम पैगाम। 

चूने की रंग-रोगन
पे घिसटती हथेलियां
बखान करतीं बचपन के हंगामा। 

सागवान के रेशे लैकर-चढे पलंग पर
बेसुध गद्दों में
कई एहसासों के अर्क ग़ुलाम
नज़र ने सीख लिया है
एकटक टिके रहना निस्तब्धता में
सालों घिसे फ़र्श के मोजैक के उखड़ते टुकड़े
ले लेते हैं फटी एड़ियों से इन्तेक़ाम। 

~ सूफ़ी बेनाम



Saturday, October 1, 2016

भीतर ही भीतर

कौन पढ़ रहा है मुझको
भीतर ही भीतर
गुदगुदा के पनने पलटता है
कौन पढ़ रहा है मुझको
अँगुलियों से
वर्णों की मालाछूता है
कागजों की करवट बदलता है
रोकता है पलटने से
जूड़े की कांटी से
कौन पढ़ रहा है मुझको
महसूस होता है कहींपर
कौन पढ़ रहा है मुझको
भीतर ही भीतर
महसूस होता है
शब्दों की धरा में
धंस सा गया था
हक़ कागजों का कलम से
लिखता गया था
खुद को ज़ाया किया है बहुत
मैंने
माया को कागज़ पे रचकर
कौन पढ़ रहा है मुझको
मेरे भीतर ही भीतर
हर बात जो लिखता था
हर बात जो कहता हूँ
वो सच नहीं
सपना भी नहीं, मगर
अल्फ़ाज़ों के मिलने जुलने से
हालात बदलते थे
सो लिखता था
हर मोड़ नए शब्द
शब्दों से मिलते थे
तो लिखता था
एहसासों का स्वाद है मुझको
सो कहता हूँ
कोई भीतर ही भीतर
पढ़ रहा मुझको
जानता हूँ।


~ सूफ़ी बेनाम






दुप्पटे के नकापोश

एक सीधी लकीर ........
गाड़ियों का हुजूम
अनवरत ज़ारी
कल्पना की स्कूटी
सफारी पे भारी
ज़ूम करके निकलती
दुप्पटे के नकापोश
बन ट्रैफिक विकर्षण
क्या करे बेनाम फरामोश
भच्छ से दे मारी
आगे की गाड़ी
रेंगता हुआ समय
रेंगती धड़कन ........


~ सूफ़ी बेनाम