Friday, April 1, 2016

ग़ज़ल में भी पुराने यार होंगे

सफर मतले वही दो-चार होंगे
ग़ज़ल में भी पुराने यार होंगे

झलक तेरी ज्यों खिलने लगेगी
हमें एक बार यूं दीदार होंगे

जहाँ थोड़ा शफ़क़ सूना लगेगा
वहाँ हम तुम मिसाले यार होंगे

नज़र जब फिर रुकेगी नज़र पर
बड़े ही जाँफ़िदा व्यापार होंगे

कहानी फिर ज़रा लिखना लबों से
न जाने कब कहीं दीदार होंगे

हमीं को भूलना होगा समय से
वरन रिश्ते सभी बाज़ार होंगे

उम्र मौसम समझ ने हैं बुलाये
जवानी में ग़ज़ब के खार होंगे
~ सूफी बेनाम



डूबने को फिर सपना हो न हो

डूबने को फिर सपना हो न हो
हसरतों का आँसु गहरा हो न हो

रह वफ़ा के गाँव में गर घर मिले
हसरतों को मन चुना क़स्र हो न हो

आज तू इस लम्स को कुर्बान दे
चाह का तक़दीर खंजर हो ना हो

राह को दो चार जो मंज़र मिले
रास्तों का कोइ दिलबर हो न हो

फिर ठिकाने खोज करते काफिले
शाम को फिर रात का घर हो न हो

हर किसी के दौर आता आसमा
पर कभी अख्तर मुकद्दर हो न हो

हौसला रख हर कहीं मेरा निशां
हर इबादत श्याम का घर हो न हो
~ सूफी बेनाम
क़स्र - palace,


अंदाज़ हसीनो का एक राज़ शराफत का

अंदाज़ हसीनो का एक राज़ शराफत का
क्यों ज़ख़्म सजाये हैं इमरोज़ इबादत का

हर शाम सिरे लेकर एक ग़ज़ल से मिलती थी
बा खूब उभर आया एक राज़ क़यामत का

कमज़ोर स राब्ता हैं दो हर्फ़ जुदाई के
पर शेर कसर रखते नादान कि हसरत का

मिल कर जिस आशिक़ से रहते हम पागल हैं
रखता है परवाना अंदाज़ अमानत का

बेगार सफर में भी हर मोड़ गली वो ही
हर राह खबर रखती बेनाम महोबत का

~ सुफिबेनम



यार उससे बात करले यारी पुरानी है बहुत

जल चुकी है हकीक़त आग पानी है बहुत
बस रहा है ख्वाब में दिलबर कहानी है बहुत

दौड़ आना तुम कभी गर याद हम आने लगे
दूरियां-नज़दीकियां यूं जाफरानी है बहुत

दिखते बाज़ार में हो रोज़ मर्रा शाम को
रूबरू तुमसे नहीं, चाहत रवानी है बहुत

कुछ करीबी दोस्त मेरे रोक कर कहने लगे
यार उससे बात करले यारी पुरानी है बहुत

चाहे जितना भी बुझाले आस बढ़ती जा रही
मयकदा दुनिया बनी हमको चढ़ानी है बहुत

हम तरीका ढूंढ लेंगे तुम शराफत से कहो
हर जगह चलती नहीं ये पहलवानी है बहुत

दूध पीपल को चढ़ाते लोग हर शनिवार को
काट हर ईज़ा की कथा पुरानी है बहुत

रोक देंगे गर हमें तकलीफ तुम देने लगे
प्यार की भाषा न समझे नार फानी है बहुत

~ सूफी बेनाम


अंग के प्रसंग रंग, रंग मोहे अंग अंग (होली गीत )

अंग के प्रसंग रंग, रंग मोहे अंग अंग
रंगे  है अबीर लाल, भीग बादलों के संग

होली खेले बजरंग, सीता माई संग संगे
रघु ले कर गुलाल, देखे नार का हुरदंग

भांग चढ़े मंद मंद, दिल सिंचते हैं संग
हुल्लड़ की टोलियों में, भीग संग अघ-नंग

अंगद रावन खींच, सख्त बाजुओं में भींच
भीगी  तरंग पे अंग, लंका भई सतरंग

ख्वाइशें पी आयीं भंग, मालपुए कश संग
चीथड़ों से दिख रहे, तेरे गुम अंग नंग

लक्षमन ढके अंग, सुरपंखा  करे तंग
जोबन से तंग अंग, लचके कमर संग

देसी औ विदेसी मेमे, होली सब एक संग
अहीरों के नर-नार, रंगे ठाकुरों के संग

होली खेले बजरंग, सीता माई संग संगे
रघु ले कर गुलाल, देखे नार का हुरदंग

~ सूफी बेनाम


किसी डाल पर चाहतें लड़खड़ाये

किसी डाल पर चाहतें लड़खड़ाये  
कहीं बाद हसरत नशेमन उड़ाये

दुपट्टा ज़रा तू संभलके उड़ाना
कहीं आरज़ू उलझ मेरी न जाये

कलीमा न पलकें न काजर के मिसरे
नफ़स जाम से ज़ुल्फ़ के मन्द साये

कफ़स का सलीके हमें क्या पता था
कि बाहों रही क्यों गुलिस्तां बसाये

न चिमटी न कंगन न बिंदिया न कुमकुम
अराईश  इनकी तुमे भी सताये

न बेनाम रखना कभी याद मेरी
ग़ज़ल तिशनगी-दासतां गुनगुनाये

~ सूफ़ी बेनाम



हमने रात गुज़ारी तनहा


अपनी करवट हम सोये थे 
तुम आये आलिंगन करने 
स्वप्न पराग के मधुकर बनकर  
मन-मकरंग जगाया किंचित  
हम बेसुध निद्राई ही थे      
तकिये को आगोश में भर कर
रह गये तनहा कुस-मुस कर
हमने रात गुज़ारी तनहा 
  
तिमिर को पैबंद लगी जब 
खोले आंखों ने जब बिस्तर
सांसें  कुछ आवेश में भरकर 
जाग उठा ठहराव को तजकर 
एक सिलवट मेरी बांह जकड़कर 
चूमी मुझको नाक टकर-कर 
पूछ बैठी कि थे कहाँ खोये 
कह गुज़रा मैं तनहा रात भर
~ सूफ़ी बेनाम