Friday, February 21, 2014

एक साड़ी में लपेट लिया

एक साड़ी में लपेट लिया
पूरी शाम को तुमने
हम सब बारी बारी से आते थे
तुम्हारे पास कभी छूने- चिपकने
कभी तुम्हारे स्पर्श को।

उधड़न जो तुम्हारे
ब्लाउज और बदन के बीच
से मिठास छलकाती  है
जज़्बात जगती है और  बेमर्म
मेरी नज़रों को चिकोटती रहती है।

नीचे से झलकते तुम्हारे
कागज़ी पाओं में लिपटी
नाज़ुक सी बिछिया, पायल
गले में कंचन, कुण्डल
और सुर्ख रंग का श्रृंगार।

ना जाने अब और क्या चाहती हो मुझसे ?

~ सूफी बेनाम



Tuesday, February 18, 2014

ऐसा देखा गया है

ऐसा देखा गया है
जब भी कोई अंजाना सा
नया मौसम, नया दर्द
उम्मीद में जगता है
तो फँस जाता है
रूंध के, बादलों में।

अराइशों के,
इस पतझड़ में,
किसी फितरती चाह
या उम्मीद को,
जब दो आँखें मिलती हैं
तो शबनम की कुछ बूँदें
मोती बनकर खिलती हैं
कुछ  सूख  जाती हैं,
या ढलक जाती हैं - टीस में।

कुछ जो संजो के रक्खी हैं,
सदफ़ - ए - तवक्क़ो में
मोती बनकर शायद कभी
किसीके आभूषण को
कबूल हों  ।

~ सूफी बेनाम




अराइशों - images ; सदफ़ - shell  ;  तवक्क़ो - expectation,hope

Saturday, February 15, 2014

जाने किसके साथ तुम रहती हो ?

जिसके साथ तुम रहती हो
वो कुछ कुछ मेरे जैसा है
जिसको चाहती हो दिलो जान से
और हर दिनों-दोपहर जिसके करीब
बीत रहे हैं हर मौसम
जो तुमको अच्छा लगता है
वो कुछ कुछ मेरे जैसा है।

कभी कहीं पर हम दोनों एक से थे
वो तुम्हारे साथ चला गया
मुझको भी एक बेनाम कि छत है।
मिलता नहीं है अब मुझसे वो
जो कुछ कुछ मेरे जैसा है
तुम्हारे प्यार में वो खोया है
जो कुछ कुछ मेरे जैसा है।

~ सूफी बेनाम






तरकश

मय के प्यालों की
बंद अलमारी के से
तलफ्फुज़ का सा
बदमस्त हसीन चेहरा।

तुम्हारे होंठ बड़े भी थे
कुछ कहने को
पर कान के बूंदों से
छनकती आवाज़
की ना मंज़ूरी पे रुके
झिझके और बिखर कर
मुस्कुरा दिए।

आँखों की तरकश में
जहाँ तने रहते थे
तीर काजल के
वहाँ पुतलियों की
कमानियां हताश किसी
ख्याल में खोयी हुई हैं।

उम्मीद है ये
मुस्कराहट बनी रहे
न सही मेरी आँखों को;
किसी के होठों को
तस्सली तो है।

~ सूफी बेनाम





तलफ्फुज़ - expression    ;बदमस्त - intoxicated

Thursday, February 13, 2014

वो कौन है, जिसे लोग, मेरे नाम से जानते हैं ?

अपनी हसरतों से अक्सर ही
मैं पूछता हूँ
वो कौन है, जिसे लोग
मेरे नाम से जानते हैं ?

कुछ जो आये भी करीब भी
इन अधूरे से जज़बातों के
एक बेनाम शक़्ल से मिल कर
लौट गये।

हर रोज़ गहरी हो रही है
हक़ीक़त और वज़ूद की दरार
न जाने किस ज़िक्र पे
ये भर पायेगी।

~ सूफी बेनाम


Tuesday, January 21, 2014

शाम

रफ्ता - रफ्ता - आहिस्ता  …
कुछ देर को रुकी तो थी,
वो शाम तुम्हारे इंतज़ार को
पर सिर्फ अपनी ख्वाईश पर
उसे रोक न पाया।

वो लौट के आती भी रही
हर रोज़ उसी पहर पर
पर शायद तुम वो दिन
बिता न पाये जहाँ हम
तुमको छोड़ आये थे।

आज भी शाम मेरे सामने
एक बंद ताबूत सा लेकर बैठी है
उसमें उलझे टूटे से
कुछ अधलिखे मिसरे बिखरे हैं
अब इनको पिरो नहीं पाता।

उलझन उन अंधेरों की है
या दिन कि तहक़ीक़,
देखा तो है हर तारिख पर
एक नये दिन को रात का
हाथ थामने को बढ़ते हर शाम को।

~ सूफी बेनाम


Wednesday, January 15, 2014

बूचड़खाना

मेरे कसाई को मालूम है
जिस्म का कौन सा हिस्सा
किस काम का है।

और क्यूँ न हो
कटे हुऐ बदन को
बोटियों में बदलना
खाल को करीने से उतारना
अंतड़ियों को बाहर फेंकना
गुर्दे - कलेजी पे लगी चर्बी को
छीलना , साफ़ करना
रान और चाप की नज़ाकत
वो खूब समझता है।

मेरे रक्त-रेज़-क़ातिल
इस पेशे में, एक हुनर से
कला में पहचाना गया है।
इसी से मेरे कसाई की
दुकान चलती है।

किसे पता था
खुले खलिहानों और
नम हरी दूब
पेड़ों की छाओं में
कूदें लगाते ये साल,
किसी दगा से
मेरे खरीदार के नाज़ के लिए
कभी ईद , होली, दिवाली को
कुछ गोश्त की बोटियों में
पहचानी जाएंगी।

~ सूफी बेनाम