Thursday, April 25, 2013

हरश्रृंगार


अवर्तमान आदित्य के संयोग से
शरद ऋतू के आगमन पर
शीत ऋतू का विज्ञापन सा लेकर
हजारों दीयों के से टिमटिमाते
हरश्रृंगार के यह फूल
तुम्हारे साथ की खुशबु पा कर
मेरे अंतर मन में बस से गए हैं

अक्सर ही मेरा मन
व्याकुल हो जाता है हरश्रृंगार के इस अभ्यास से
जीवन-दिन का उजाला जब लुप्त हो जाता है
तो शायद अपने लिए ही या उजाले के आभाव को मिटाने
यह फूल खिलते हैं और चढ़ती हुई लालिमा को प्रणाम करके
बिखर जाते है।








शार्ट- सर्किट




5 एम्पेयर की करंट  पर चलने वाला
एक रिश्ता
अचानक  15  एम्पेयर  की  मांग  
कर  बैठा  है
शांत पड़े तार  भी इसकी
ज़रुरत  से बार  बार  
गरम  हो जाते हैं 
कांपने लगते  हैं
दीवारों  की छुपी  हुई  
झीरिओं  में  बंद
यह  तार बेपसीना हुए
सुलग  रहे  हैं
एम . सी  . बी  . भी  लगातार  
ट्रिप  हो रहा है
मै  बहुत  कोशिश  कर  रहा  हूँ  पर
रौशनी  थम  नहीं  पा  रही  है
बिजली  चली  जाती  है।

~  सूफी  बेनाम .





शक्लें

अब तो यह वाकिया,
कुछ ऐसा  ही रहेगा
किसी बेपनाह बेबाप की  सी  
नज़र से दुनिया देखेंगे ,
और हर मोड़ पर तुम्हारा ज़िक्र
मेरे महबूब करेंगे
अब तो यह वाकिया,
कुछ ऐसा  ही रहेगा
माना  कि  ज़िन्दगी  ने कोई
इलज़ाम  न दिया
पर न ही मज़हबे-ए -पाक  दिया
और न हि  जूनून - ए - फरहाद
हम तो बेबस  ही रहे
सांसों  के  हॊने और
न हॊने के बीच।
अब तो यह वाकिया,
कुछ ऐसा  ही रहेगा
हर  किसी  मोड़  पे
हम  फिर  मिलेंगे
रेत  के  अबार  पर  बेवजह
बिछी  सबा  की  तरह
बेसब्र, बेवजूद  बस
महज़  कुछ  पल  के  लिए
शक्लें बदलती  रहीं
पर कुछ भी अधूरा तो नहीं
अब तो यह वाकिया,
कुछ ऐसा  ही रहेगा।


~  सूफी  बेनाम



योगी की माया


बहुत बेतुकी जीवन की है।
अदभुत सी है ये माया।
असमंजस में आज फंसा हूँ,
अनुरागी का भाव लिये।
योग वियोग से जीवन सजता
ब्रह्म-मलय सी है माया।
लोग मिले, संजोग सजे,
कलको, आज बिगड़ने को ?
आज नहीं जो कल था मेरा 
जो आज मिले संजोग सजे।

अनुरागी का जीवन सजता 
राग,  वैराग्य और द्वेष लिए।
आनंदित होने को व्याकुल,
अनुरागी की यह काया।
अनुरागी सा जीवन मेरा 
वितरागी उपदेश गहे ?
समय नहीं था इस को समझूं 
समय नहीं कुछ कान करूं।
संभव है कुछ कर गुज़ारूंगा 
संभव जग माया को समझूं।

पर एक तरफ था युग का साया 
और एक तरफ योगी की माया।

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मेरे मन का सूनापन



कल मैं बहुत खेली  थी .
मेरी छुट्टी थी
माँ भी नहीं थी
पापा भी कहीं थे
थी बस एक बहन, जो मुझ सि बंधी थी
और मुझ से जुड़ी  थी
दादी के साए से पली
बाबा की कहानियों में बड़े हुए थे
हमारे बचपन के दिन .

पर शायद माँ होतीं तो
 रात के पहले पाँव धुलवाती   .
या पापा होते तो सोते ही मेरे पैर
पोछे जाते , और मैं सोने का नाटक कर करवट बदलती
कल मैं बहुत खेली  थी .
मेरी छुट्टी थी
माँ भी नहीं थी
पापा भी कहीं थे.


परोक्ष


उस सर्द – सुनसान रात की 
अविज्ञ नीरस-सूनी तन्हाई  में, 
जिसको मेरी अयोग्य आँखों ने  
अपनी साधुता से – आग समझा
वह तो अँधेरे से साए से ढके 
एक निष्ठुर अधीर दरिया में 
दूर निरुत्साहिक रोशनी की 
चंचल-मोहक प्रतिबिम्ब थी।
सत्य-सचेत हो कर भी 
मै अपनी बेबसी में 
उस ओर देखता रहा,
और आँखों में झलकी गर्मी से 
ठंडी हवा के भेदन को सराहा। 
आज न जाने क्यों 
इस बात की कचोट है कि 
मेरे पहचानने की शक्ति 
रंगों में ढकी हुई है 
मेरे समझने का बूता 
सपनों से रंगा हुआ है।
एक जगत  है जिसमे 
मै ज़िन्दा  हूँ और 
एक परोक्ष वजह  है जो 
सांसों में आस बनाये रखती है।
~ सूफीबेनाम  



क्यों बेसब्र हो रहे हो ?



रात धुली है, दिन चढ़ेगा,
फिर वही आलम पुराना ..
शाम तक दम तोड़ देगा 
क्यों बेसब्र हो रहे हो ?

नाम रखके क्यों चले हैं ,
यह मैला चोल पुराना 
कल कहीं साथ छोड़ देगा 
क्यों बेसब्र हो रहे हो ?

सज रहा है फिर से देखो 
आसमा में तूफानी बहाना 
विनाश का यह रंग पुराना 
क्यों बेसब्र हो रहे हो ?

तुमने जो तिनके बटोरे 
राह बिखरे फूल गॊये 
एक मंदिर पर सब साथ छोड़ देगा 
क्यों बेसब्र हो रहे हो ?

राहगीरों को रिश्तॊ का नाम दे 
जीने का बहाना पुराना 
फिर तुम्हारा दिल तोड़ देगा 
क्यों बेसब्र हो रहे हो ?

~ सूफीबेनाम