Thursday, October 6, 2016

रुके हुए कमरे

रुके हुए कमरों की चार दीवारी में
झांकते हुए दरीचों पे अटकती
उड़ती चिड़ियां
नीली झीलें
बदलते आसमान
बिखरे गुलफ़ाम।

शायद,
पलट कर देखने पर मिलने लगें
बंद दराजों के
अनखुले लिफाफों में बेनाम पैगाम। 

चूने की रंग-रोगन
पे घिसटती हथेलियां
बखान करतीं बचपन के हंगामा। 

सागवान के रेशे लैकर-चढे पलंग पर
बेसुध गद्दों में
कई एहसासों के अर्क ग़ुलाम
नज़र ने सीख लिया है
एकटक टिके रहना निस्तब्धता में
सालों घिसे फ़र्श के मोजैक के उखड़ते टुकड़े
ले लेते हैं फटी एड़ियों से इन्तेक़ाम। 

~ सूफ़ी बेनाम



Saturday, October 1, 2016

भीतर ही भीतर

कौन पढ़ रहा है मुझको
भीतर ही भीतर
गुदगुदा के पनने पलटता है
कौन पढ़ रहा है मुझको
अँगुलियों से
वर्णों की मालाछूता है
कागजों की करवट बदलता है
रोकता है पलटने से
जूड़े की कांटी से
कौन पढ़ रहा है मुझको
महसूस होता है कहींपर
कौन पढ़ रहा है मुझको
भीतर ही भीतर
महसूस होता है
शब्दों की धरा में
धंस सा गया था
हक़ कागजों का कलम से
लिखता गया था
खुद को ज़ाया किया है बहुत
मैंने
माया को कागज़ पे रचकर
कौन पढ़ रहा है मुझको
मेरे भीतर ही भीतर
हर बात जो लिखता था
हर बात जो कहता हूँ
वो सच नहीं
सपना भी नहीं, मगर
अल्फ़ाज़ों के मिलने जुलने से
हालात बदलते थे
सो लिखता था
हर मोड़ नए शब्द
शब्दों से मिलते थे
तो लिखता था
एहसासों का स्वाद है मुझको
सो कहता हूँ
कोई भीतर ही भीतर
पढ़ रहा मुझको
जानता हूँ।


~ सूफ़ी बेनाम






दुप्पटे के नकापोश

एक सीधी लकीर ........
गाड़ियों का हुजूम
अनवरत ज़ारी
कल्पना की स्कूटी
सफारी पे भारी
ज़ूम करके निकलती
दुप्पटे के नकापोश
बन ट्रैफिक विकर्षण
क्या करे बेनाम फरामोश
भच्छ से दे मारी
आगे की गाड़ी
रेंगता हुआ समय
रेंगती धड़कन ........


~ सूफ़ी बेनाम



Thursday, September 29, 2016

सांस के पिंजर फंसे हर आशना एहसान से

डॉ शैलेंद्र उपाध्याय का एक शेर है :

लाख दुश्वारी सही, हर साँस में इक दर्द है
जी रहे हैं लोग फिर भी जिंदगी ये शान से

वज़्न - 2122 2122 2122 212
अर्कान - फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

काफ़िया - आन
रदीफ़ - से
इसमें गिरह दे कर ग़ज़ल में उतरने की एक कोशिश :

गिरह :
टूटता हर मोड़ पे है देख हसरत का फितूर
जी रहे हैं लोग फिर भी जिंदगी ये शान से

मतला :
आज उम्मीदें जगीं हैं हर किसी अनजान से
सांस के पिंजर फंसे हर आशना एहसान से

अश्क़ भीगी रात का चहरा छुपा ले जायेंगे
रश्क़ क्यों इतना करें इक बेज़ुबाँ अरमान से

दिल जले फिर से मिलेंगे उम्र के उस मोड़ पर
इश्क़ को मज़हब बताने हुस्न की पहचान से

कोई ज़िन्दा तो बटोरे स्वपन के आशार को
टूटते हर रोज़ हैं ये हर किसी इंसान से

फलसफा मिलता नहीं अब साथ देने के लिये
सैकड़ों बेनाम मजलिस याद के फरमान से

~ सूफ़ी बेनाम


Wednesday, September 28, 2016

बीज कई परतों में दबाया हुआ है

अब सस्य के समूचेपन को समझो
बीज कई परतों में दबाया हुआ है


रस लदे यौवन का सौंधा-पन उड़ेले
सूखती शाखों पे फल छाया हुआ है


एक प्रकार को सजी बाहरी बनावट
उत्तेजना से उम्र भर ज़ाया हुआ है


बढ़ता आ गया फसल का मौसम
फलों ने दरख़्त को झुकाया हुआ है


न वृक्ष-डाल, न पात-साधना फल
वृक्ष ने नाम फल का पाया हुआ है

चेतना के अनु-कण बीज-धारण
जड़ों का फैलावा माया हुआ है


अब सस्य के समूचेपन को समझो
बीज कई परतों में दबाया हुआ है


सृष्टि में पैदा हुए कई  बेनाम जंगल
तर्क-औचित्य का फल आया हुआ है
~ सूफ़ी बेनाम





Friday, September 23, 2016

कर्म की बही में लिखी संवेदनायें

मेरे अन्तर्मन की निस्तब्धता
बाहरी व्याकुलता के नंगेपन को
अपने मखमली एहसास से
इस तरह ढक जाती है
जैसे खुले ज़ख्म पे भिनकती मखियों से
किसी लोबान्त का उपचार लगाती हैं।

मुसलसल कर्म की बही में लिखी संवेदनायें
आभासों को निस्तब्धता के
उस पार से, धरणी दबी आर सी सी की
राफ्ट फाउंडेशन के भीतर निहित
सत्य की सरिया को टोर से मज़बूत बनाकर
हर होनी हर घटना कर्म को पूर्वनिहित बनाती हैं।

प्रज्ज्वला मस्तिष्क के ठीक भीतर
एक स्थल से प्रफुल्लित हो कर
रीड़ की हड्डियों की इडा-पिंगला को झंकृत कर
सूक्ष्म अणु-निहित चेतनाओं को करके उजागर
कुछ नए दर्पणों को खोलती माया बस
मन-बदन-चेतन-चैतन्य के पात्र बदलती है।


~ सूफ़ी बेनाम



कदम अब बेवफा हैं इस कदर पर

अख़्तर होशियारपुरी का एक शेर है :

परिन्दों से रफ़ाक़त हो गई है
सफर की मुझको आदत हो गई है


इनके सानी मिसरे से गिरह दे कर ग़ज़ल में आगे बहने की कोशिश कर रहा हूँ :


कदम अब बेवफा हैं इस कदर पर
सफर की मुझको आदत हो गई है

मिली है धूल राहों में हमेशा
समुन्दर की वसीयत हो गयी है

फटी एड़ी लहू तर हैं ये धीगें
सफर दिल शौक नफ़रत हो गयी है

कि शायद दौर ऐसा था नहीं पर
नशेमन में बगावत हो गयी है

दबे मोती नदी नाले मिले पर
लहर खार -ए-हकीकत हो गयी है

सहर पर लालिमा फिर से चढ़ी जब
दिनों में कैद ग़फ़लत हो गयी है

रहे कुछ दोस्त बे परवाह से ही
दिल -ए-बेनाम हरकत हो गयी है


~ सूफ़ी बेनाम