Thursday, September 22, 2016

तकिये

कहो !
क्या निस्तब्धता को
आदित्य की अवर्तमानता को
क्या नींद को उकेरने-उभारने ही को
ये रातें बनी हैं ?


कहो !

क्यों कच्ची गरदनों टेकने को,
ख़्वाबों की टूटी श्रृंखला दबाने को
पाहु-पाश के रत्यात्मक एहसासों को
तकियों की ज़रुरत पड़ने लगी है ?



कहो !
बदलकर कब हाड़-मॉस की मुड़ी हुई कोहनियां को
जीवांत पेड़ों के लट्ठों, ईटों चट्टानों को
सूती दायरों में कैद मखमल और कपास के अम्बारों ने
शयन कक्ष में एक तकियायी हासिल की है ?


शायद
विलासता और सुख साधना में धंसकर
मनुष्य जीवी प्राणी उस स्तर पे पहुंचा है कि
समय सारिणी से जीवन बिताता है तकियों पे सोता है
स्वप्न-दर्शी संभावनों को झूठा बताता है।


~ सूफ़ी बेनाम


Sunday, September 18, 2016

सीले तौलियों में सौंधापन पसीने का

सीले तौलियों में सौंधापन पसीने का
कागज़ अपना कोरापन छोड़ कर
हम-सुखन हर्फ़ों से गहरा हुआ
हज़ार बातें सुन कर ब्लैक-बेरी
मोबाइल फ़ोन बहरा हुआ ,
फाइल से झांकते टैग लगी पुर्जियां कागज़,
संतुलित एक सूक्ष्म-शून्य ठहरा हुआ,
बिखरी किताबें, स्पाइरल गुदे ड्राफ्ट्स,
येलो-स्ट्रिप्स पे लिखे काम,
लोगों के नाम,
हज़ार भूलें, गलतियां, नुक्ते , अंगुलियां,
लैपटॉप, प्रिंटर, पेन , पेंसिल, पब्लिशर,
गिफ्ट मिला मफ़लर, अनामिका-तर,
मल्टीविटामिन, त्रिफला,
थालियां, बोतलें, बैग,ज़मीं बिछा गद्दा,
चद्दर , ए.सी., तकिया,
स्टडी की छत से गलतियों को घेरकर
छलांग लगते 2B पेंसिल के एरोस चुभोकर,
री -सायकिलड पेपर्स की गड्डियां
फटे लिफाफों पे लिखी चिट्ठियां,
ब्लड रिपोर्ट्स और जिम में बातें
घण्टों की लाल सफ़ारी ,
सौंदर्य लहरी,
सच तले रुन्दते बेहिसाब झूठों की सिसकियाँ
काक चष्टा, झूठी थालियां,
सब सिमट गए 177 पन्नों के कूचे में बेलगाम
पोइसिस सफ़र पहला कदम बेनाम।


~ सूफ़ी बेनाम





Thursday, September 15, 2016

अस्ल की दूर तक उड़ाने हैं

मतला :
फिर नहीं लौट कभी पायेंगे
पल अगर बीतने दो आयेंगे


नोच निकले अगर सुबह कोई
रात इकसीर हम बनायेंगे


महफिलों में ग़ज़ब अकेलापन
हम नवां रोज़ मिल न पायेंगे


कल तलक इश्क़ के बहाने थे
मुश्क अब किस तरह निभायेंगे


रूज की शाम बज़्म बोसों की
साँस को किस तरह बुझायेंगे


अस्ल है रूह में छुपा गाफिल
बुत बदन तुझसे मिलने आयेंगे


प्यास को इस तरह नफ़ी मत कर
लत-तलब बन हमी सतायेंगे


अस्ल की दूर तक उड़ाने हैं
हम सुखन लिख फलक सजायेंगे


~ सूफ़ी बेनाम

( 2122-1212-22 )



Monday, September 12, 2016

अब वक़्त आ गया है

इस शहर की परत दर-परत उधेड़नी पड़ेगी
घेराबंदी करनी होगी गलियों, बाज़ारों, कूंचों की
कुछ दूर निकल के आना पड़ेगा ज़िन्दगी से
तब क़त्ल-दफ़न, दोस्ती की लाशें मिलेंगी।


ज़मी को ताकते दरख्तों पे लटकते सस्य के
जीन-कोड की बारीकी से जांच करने के लिये
नोच के निकलना होगा छिलके और गूदे को
तब कहीं सुप्त-असल के क्षुद्र बीज मिलेंगे।


विदित नहीं होगा कभी सिर्फ़ सूर्य की रौशनी से
अस्ल, जो जीव आवर्ती पुनरुथान से उलझा हुआ है
मूंद-आखों को वृत्तियों में अहम् का हवन कर
मधु-स्थल में हाथ डालना होगा पीड़ा के चर्म को छूने के लिये ।


अब वक़्त आ गया है।


~ सूफ़ी बेनाम



कवि एकाकी जीव है

कवि एकाकी जीव है,
पटल पर कुछ लोगों का मिलना
दोस्ती हो जाना
सब अनायास था, खुद बा खुद होता गया।
शुरू में उनके अल्फ़ाज़ों की कुलबुलाहट
उनके जस्बातों के दर्पण ....
लगने लगा की सबमें
मैं ही हूँ।
खुद को उनमें देखते-देखते
वाह-वाह करते एक लम्बा अरसा गुज़ारा हमने
कोई मुझे अपने छंदों से बाइस साल का महसूस करवाता
कोई ग्रीष्ममयी जीवन-व्यथा की प्यास मुस्कुराकर बुझाता।
फिर क्या था
ग़ज़ल का दौर चला
छंदों को बहर में बाँधा
और हर ख्याल को मन कानन के अँधेरे में भींच कर कलम किया।
लिखने की हवस बढ़ती रही
मेरे भीतर के इंसान को ढक कर
शायद मैं भी कवि सा हो गया
शायद कहीं कागज़ पे खो गया।
पर आज जगा हूँ
तो खुद को समेटना मुमकिन नहीं है
कुछ हूँ साथ अपने
कुछ दोस्ती में बाँट आया हूँ।

फिर एकाकी हो गया हूँ।


~ सूफ़ी बेनाम



Tuesday, September 6, 2016

मकरंद

जो ख़्याल
ठौर-बदन ढूँढ़ते थे
बे-नब्ज़ बेनाम
किताबों में
अपना इमान रखने लगे।


क्यों कागजों ने सोख  ली
वो स्याही
जो बहकर
पत्तियों में रंग भारती ?
बदकिस्मत !
अल्फ़ाज़ों की गिरह को
सच समझ बैठी।


~ सूफ़ी बेनाम


Wednesday, August 10, 2016

स्वरचित

लिखते-लिखते
शब्दों से खुद
एक जाल सा बन जाता है।
स्वरचित ही
मुझे
फाँस लेता है।
अपना-पन अपने शब्दों में
इतना होता है कि मैं
रोक नहीं पाता इनको।
मात्राओं ,आवाज़ों, अल्फ़ाज़ों में
उलझ सा जाता हूँ
कविता बहाता हूँ।
जाल में फंसे घुन की तरह
उलझता फंसता सांसों को घेरता पिरोता
अंत में मुझे शब्द खा लेते हैं।
बची हुए बेनाम अस्थियों में
कवि कहलाता हूँ।


~ सूफ़ी बेनाम