Saturday, September 5, 2015

उबल कर नादां

 उबल कर नादां खुद ही से उफन जाते हैं
आतिश-ए-तक़दीर के नज़ीर रह जाते हैं।

मदार-ए-हकीक़त रह गया रूह का जुनूँ भी
बदन में ज़िंदा हैं और बदन में मर जाते हैं।

पुराने हो कर के दोस्ताना-ए-मौसम सभी
अपनी-अपनी गिरह में सिमट जाते हैं।

शिकस्ता हो कर के वीराना-ए-आलम भी
अपनी हदों के पार शहरों में बदल जाते हैं।

रिश्ते जो ओढ़ रक्खे थे खुद के लिये कभी
उन्स-ए-लम्स को बे-सलाह छोड़ जाते हैं।

होश रहता नहीं कि बदलती तारीखें भी
ना-दानिश खाई में ले के फिसल जाते हैं।

~ सूफी बेनाम

मदार - orbit , उन्स - friend , lover. दानिश - known ,  नज़ीर - example



Saturday, August 29, 2015

किस्से का कहानी तक आना हुआ

किस्से  का कहानी तक आना हुआ
अल्फ़ाज़ों में एक शहर बसाना हुआ।

कोई नया बहाना  दे ऐ ज़िन्दगी
मोहब्बात का मतला पुराना हुआ।

बुलबुला जो सफर-ए-दीवानगी  था
कागज़ पे सूख के शिनासा हुआ।

मात्राओं की गिरफ़्त में एक किस्सा
ग़ज़ल तक पहुँचते अंजना हुआ।

सूद-ओ-ज़ियाँ का बचा कोई हिसाब
 या डायरी का रद्दी में जल जाना हुआ।

हमने मिन्नतें अल्फ़ाज़ों से की बहुत
ढूंढ़ना उन्ही रास्तों को बेईमाना हुआ

सूद मिसरों में बंधी एक ग़ज़ल मिली
असल को गुज़िश्ता-ए-यार भूलना हुआ।
~ सूफी बेनाम


कभी कभी की मुलाकातें

मेरे कुछ दोस्त जो
दो-चार साल में
मिलने चले आते हैं,
बहुत तकनीक से
लड़कपन में उतार ले जाते हैं।
दो पल में २०-२५ साल का सफर
पार कर लेते हैं और
चलते चले जाते हैं।
पर शायद और जवानी
किसी को रोक नहीं पाती,
कोई संभालता नहीं है,
कोई उम्रदार हो जाता है।
मुलाकात कुछ घंटों की
पोशीदा मुस्कराहटों में ग़ुज़र करती है
और उसी में छिटक जाती है।
बातों में किस्से  हर बार नये होते हैं
कोई कुरेदता है, कुछ  नया पंगा लेता है।
पर सीख हर एक यही ले के घर जाता है
शिफ़ा  तजुर्बों का, हर एक
अपने बचपन को ढूंढ़ लाता है ।
~ सूफी बेनाम


Wednesday, August 19, 2015

शादी की पच्चीसवीं सालगिरह

चुप बैठे एक कमरे के कोने-किनारे मौन हैं
पच्चीसवीं सालगिरह पे रिश्ते ये प्यारे मौन हैं।

दर्द -ए-मोहब्बात से हर शिकायत कर चुके
गुजरने का अंदाज़ देखो जिस्म हमारे मौन हैं।

हर उलझन पे अटकते हुए कहीं उतरे थे हम
गिरह खुल चुकी फिर भी सपने सरे मौन हैं।

आज पैसा है ईंधन  है गाड़ी की मनमौजी का
रास्ते सब मौन हैं, मनसूबे तुम्हारे मौन हैं।

पसंद नहीं मुझे इन कागज़ों पे लिखना तुम्हारा
आज जितना भी लिखो पर  सितारे मौन हैं।

चुप बैठे एक कमरे के कोने-किनारे मौन हैं
पच्चीसवीं सालगिरह पे रिश्ते ये प्यारे मौन हैं।

~ सूफी बेनाम



घिसे हुए खांचों

बचपन नासमझ रहा
ढूंढ़ता रहा जवानी को
जवानी बेताब रही
पिघल  चुकी थी किसी  में
एक बरसात से मोहब्बात तक के रास्ते
और वहा से दर्द का सफर
एक रिश्ता हज़ार सपने,
सब सीखे सिखाये हुए
बच्चों की तरह पढ़ाती रही ज़िन्दगी
पहचान  को बेताब मेरा दंभ
हर मुनासिब सहारा
ढूंढ़ता रहा।
आज मेरी कविता भी
इंसानी अधूरेपन को
वही पुराने रास्ते
ढूंढ़ती है।
इन घिसे हुए खांचों से अलग
कुछ नया चाहता हूँ।

~ सूफी बेनाम



चेतना

ढूंढ़ता है गुज़रते हुए जिस्त का साथी क्यों ?
फिसलती हुई उम्मीद फिर चली आयी क्यों ?

चेतना दर्द की नहीं उम्मीदों की चुभती  है
बात इतनी सी मेरे समझ न आयी क्यों ?

माना, गुज़ारना मिजाज़ मुलाकातों का है
मेरी अधेड़ी में छुपने तेरी शाम आयी क्यों ?

स्पर्श एक मिसरे का लब पे  महसूस हुआ
पर याद किसी और वक़्त की आयी क्यों ?

उम्र की ढलान के रास्ते तेज़-चुस्त-साफ़ हैं
फिर अटकती है मेरे साथ तेरी परछाई क्यों ?

जिस समझ की दाद रही दुनिया अब तक
उसको इतनी नासमझी रास आयी क्यों ?

~ सूफी बेनाम




Wednesday, August 12, 2015

निसर्ग

एक कमज़ोर, थकी हुई
निढ़ाल ग़ज़ल के वक्ष पर
कुछ अक्षर, अल्फ़ाज़ मात्राएँ
चिपके हुए थे।
निसर्ग था
कि गोदते थे उसके स्तन
अपने
नये पैनिले दाँतों से।
वेग से कूद कर
कुछ पीछे जाते
फिर नोचते थे उसे
कुछ बूँद दूध या खूं के लिये बूखे थे ।
वो उठी, आगे बड़ी पर
कुछ दूर कूद कर रूक गयी थी
अपनी वृति से मूह मोड़ना
कुछ कठिन था।
हर अल्फ़ाज़ को जगह देती
जोड़ती, उनका पेट भारती चलती ये ग़ज़ल
अब कमज़ोर दिखती है मुझे
बे-मायने हो चली वो खूंखार ग़ज़ल ।
~ सूफी बेनाम