Wednesday, August 12, 2015

निसर्ग

एक कमज़ोर, थकी हुई
निढ़ाल ग़ज़ल के वक्ष पर
कुछ अक्षर, अल्फ़ाज़ मात्राएँ
चिपके हुए थे।
निसर्ग था
कि गोदते थे उसके स्तन
अपने
नये पैनिले दाँतों से।
वेग से कूद कर
कुछ पीछे जाते
फिर नोचते थे उसे
कुछ बूँद दूध या खूं के लिये बूखे थे ।
वो उठी, आगे बड़ी पर
कुछ दूर कूद कर रूक गयी थी
अपनी वृति से मूह मोड़ना
कुछ कठिन था।
हर अल्फ़ाज़ को जगह देती
जोड़ती, उनका पेट भारती चलती ये ग़ज़ल
अब कमज़ोर दिखती है मुझे
बे-मायने हो चली वो खूंखार ग़ज़ल ।
~ सूफी बेनाम


लहरें

क्यों गहराई से उभर आयीं थी लहरें कभी
क्या किसी सीने-किनारे टूटना ज़रूरी था।

गहनता रहती क्यों नहीं सतह पे शांत कभी
सुप्त-व्याकुलता को सतह पे उफनना ज़रूरी था।

नंगे पाँव चुन लाया था सीप का टुकड़ा तभी
सूखी चादर को सहलाब का तकाज़ा ज़रूरी था।

हाथों को खरे पानी का लम्स याद रहा फिरभी
तेरी ज़ुल्फ़ों से कुछ छीटों का बरसना ज़रूरी था।

मैं तेरी गहराई में बेनाम न रह पाया कभी
शायद चेहरों और लहरों से मिलना ज़रूरी था।

~ सूफी बेनाम


Monday, August 10, 2015

तेरी नज़्म

जब तेरी नज़्म को शमा की आग से रिझाने गया। 
मेरी परछाईं से एक बेदार मिसरा महक सा गया। 

कुछ लम्स खोजता लौ का दमकता किनारा रहा 
गुज़रती रात में तेरे एहसास का ज़िक्र बढ़ता गया। 

तुम मिली कहीं पे बेकस, मात्राओं में अल्फ़ाज़ों में 
या वक़्त रहते तुमको पढ़ने का सलीका आ गया। 

बेनाम तेरा छुपना शमा-ए-बज़्म में मुमकिन  नहीं 
मिलता हर झपक रौशनी को अंधेरों का सहारा गया। 
~ सूफी बेनाम 



Sunday, August 9, 2015

बेसाध

ज़रा कुछ देर और बसर जाने दे मुझे
एक किस्सा बन के मिलने आऊंगा।

गर ग़ज़ल के सिरे पे अटकी मेरी सांसें
तो दुसरे पे तेरा नाम उभर के आयेगा।

वो शेर जो दिक्कत तेरे लम्हों को हैं
उनको  बुनने  में मुद्दावा भरमायेगा ।

हैं वाकिया कई  जिनका ज़िक्र नहीं
तू  पढ़ेगा कभी तो शायद समझ पायेगा।

उलझनों की यातनायें क्या काम थीं
इसपर वो तन्हा डुबो के जायेगा ।

कुछ देर इस तन्हाई ने सताया मुझे
कुछ रुस्वा तेरा जीस्त तड़पायेगा।

कभी तू मेरी आँखों में उत्तर के तो देखो
एक अंगार की भसक को  छू जायेगा।

एक दिन बेफिक्र-आज़ाद परवाना कोई
तुझसे मिलने मेरी रज़ा बन के आयेगा।

तब शायद मेरी तलब का कोई आंसू
इस कदर लिपटकर उस पे बह जायेगा।

तुम समझ लोगे लम्हों का दर्द बेहतर
मुझपर शायद एक पन्ना पलट जायेगा।

कोई दिलासा रिश्तों में रोकता था मुझे
कोई मिसरा तुझे आज़ाद कर दिखलायेगा ।

~ सूफी बेनाम





बल्लीमारान

गली जो ख़्वाब शायरों के बसाती रही
एक सदी में बाज़ार-ए-चश्म हो गयी ।
~ सूफी बेनाम



Hain aur bhee duniya mein sukhanwar bohot achche
Kehte hain ki ‘Ghalib’ ka hai andaaz-e-bayaan aur
Ballimaran ke mahalle ki wo ………
…………………………………………
Isee be-noor andheri see gali qaasim se
Ek tarteeb chiragon kee shuru hoti hai
Ek quran-e-sukhan ka safa khulta hai
Asadallah Khan Ghalib ka pata milta hai.

गली-ए-ख़्वाब, शायर का घर कहीं
सदा-ए-इम्तेहाँ, बसे बाज़ार यहीं ।

अल्फ़ाज़-ए-कल्ब था जला बल्ली-मारां
किताबी रह गये उसके आशार  यहीं।

शर बदलती है गली-ए-क़ासिम शौक से
ऐ वक़्त कुछ उगे थे अल्फ़ाज़ यहीं।

ज़िक्र जहाँ उसका बिकता रह गया
बेनाम अब्र घसीट लाये गुलज़ार यहीं।

~ सूफी बेनाम



Monday, July 27, 2015

बज़्म

यूं तो लहज़ा-ए-ज़िन्दगी नहीं बदगुमां शायद
फिर क्यों हौसले पस्त रहे अरमानों पर
शब-ए-शिकस्ता कोई शमा जल उठी होगी
ज़िक्र नहीं सायों का महफ़िल-ए- सूफी पर

नाउम्मीदी न छलके कहीं अल्फ़ाज़ों में
तेरी बज़्म में देहकेंगे एक ख्याल बनकर
चार दिल और भी बहकेंगे , जलेंगे शायद
मेरी हसरतें खिलेंगी तेरी आवाज़ बुनकर

~ सूफी बेनाम


Saturday, July 25, 2015

अचार की डेलियाँ और गस्से रोटी के

बेइन्तहां अचार की डेलियाँ
रोम-रोम मसाले तर-बतर
नाख़ून के सिन्के में दाग
अब भी गस्से मुलाकातों के
किस्मत की थाली से तोड़ के
कुछ अचारी यादों के मसले
कोने से छुआ के चपाती का निवाला
दाँतों से पीस कर
सूखी रोटी के वज़ूद का
बदलता हुआ स्वाद
आहा !

सजी हुई कटोरियों की ताज़ी तरकारी
को अब क्या समझायें ?
मुझे ये आचार की टुकड़ियों को
जीभ पे चलाना,
दबा के उभरते स्वाद का मज़ा
एक खट्टी बिखरी डकार
पसंद है।
~ सूफी बेनाम