Thursday, June 18, 2015

आतिश-ए-चीनार

शाम-ए-ग़ज़ल के वो चंद मिसरे,
बहे बेहतर थे तेरी कलम से।

आतिश-ए-चीनार मेरी रूह में ज़्यादा,
सुलगकर शोला हुए हैं खुदी से।

वो राहें, वो जंगल, वो बागान जहाँ से
गुज़रते थे बादल नरम गद्दियों से।

वो खुले आसमां के नामी फ़रिश्ते
तेरी ग़ज़ल की तश्बीह को तरसे।

कदम-ए-कलम, रुक-रुक थमे से ,
तेरे एक आदाब से सालों बिताते।

तलाश-ए-नज़र को तकमील कहाँ से,
बेनाम एक नज़र के तलबगार रहे थे।

शाम-ए-ग़ज़ल के वो चंद मिसरे,
घुले बेहतर थे तेरी कलम से।

~ सूफी बेनाम



तकमील - completion 

Monday, June 15, 2015

बे-लगाम

खुद ही तो नहीं बे-लगाम कोई अदना,
करीबी यहाँ तक पहुंचा गया है कोई।

खलिश-ए-तासीर बुझी मंद रगों का
दिलासा-ए-दावार मिटा गया है कोई।

खुद ही है कातिब, राह-ए-ख़ुलूस का,
हो अंजाम कुछ भी, बेपरवाह है कोई।

खुद ही तो नहीं बे-लगाम कोई अदना,
बेनाम यहाँ तक पहुंचा गया है कोई।
~ सूफी बेनाम

दावार - justice ; कातिब - scribe; अदना - insignificant ; ख़ुलूस - purity; बेनाम - nameless and worthless.


Friday, May 29, 2015

शायरों के अल्फाज़

इन मिसरों की अदा कोई क्या समझे
मैने कागज़ पे दिल को पिघलते देखा है
कुछ मीर-औ-ग़ालिब जो हैं नहीं अब यहाँ,
उनके अल्फ़ाज़ों को खुद से सँभालते देखा है।

बड़े बेगैरत हैं यहाँ आज  के लिखने वाले
कच्चे रास्तों पे खेलते हैं नादाँ बच्चे
कुछ को मंसूबा है ज़िन्दगी उलझाने का
कुछ के अल्फ़ाज़ों को ताबीत पे चलते देखा है।


चाहे ढका रहा वो नज़्म की ज़री बूटियों में
चाहे आह किसी की उभरती जरकन में थी
किसी का दर्द पहुंचा तो उसके कानों तक
बरहाल वो बेरुख ही रहा, तो क्या हुआ ?

ऐ हुस्न-ए-फ़िज़ा  तू भी गुदी है यहाँ
किसी दिन की हसीं याद की खलिश बनकर
किसी की नब्ज़, नुक़्ता-रेज़ी में अभी बाकी है
कुछ शर्मसार हैं किसी की आरज़ू बनकर।

इन मिसरों की अदा कोई क्या समझे
मैने कागज़ पे दिल को पिघलते देखा है
साथ इंसान से बेहतर देते हैं मतले कई
कई मसले मक़्ता फिर कुरेद जाते हैं।

~ सूफी बेनाम




Sunday, May 24, 2015

बावक़्त बदलाव

हर बर्क़-ए-उजाला, चिराग बुझा दिया करो
सिर्फ रातों को इंतज़ार की सज़ा काफी है।

हर लम्हा ना याद, उन इत्तेफ़ाक़ को करो
मौसम को याद-ए-बारिश की सज़ा काफ़ी है।

लिख-लिख के न यूं कागज़ को कुरेदा करो
जज़बात को बारहा इज़हार की सज़ा काफी है।

अल्फाज़ो को बे-इस्बात सहारा ही देते रहो
दीन को एक इत्तेफ़ाक़ी दीदार की सज़ा काफी है।

लुटे रास्तों पे दोस्त, नामाबर कई बेनाम रहे
रिश्तों को बावक़्त बदलने की सज़ा काफी है।

~ सूफी बेनाम

नामाबर - messenger ; बर्क़ - lightening ; बर्क़-ए-उजाला - used for morning; बारहा - repeated; बावक़्त - in time ; बे-इस्बात - unconfirmed ; इत्तेफ़ाक़ी - occasional, by chance .




Wednesday, May 13, 2015

आम बातें

खुद में
दोबारा जागा था
रौशनी लदी सुबह
फिर हो आयी है।

कुतुबखाने की सारी किताबें
छोटे बड़े शब्दकोश
सबने अपनी जगह
वापस अलमारी में  ढूंढ ली है।

कागज़-ज़दा अधूरे मिसरे
टूटे मरोड़े टुकड़े
ज़मीन पे बिखरे हैं
ज़िद्दी बच्चों की तरह।

कोरी किताबों के बेज़ार पन्ने
अनकही बातों का बोझ लेकर
फटकर-छितरकर बहाले-खसतः
दूर रुआंसे से पड़े हैँ ।

शायद डस्टबिन में
जगह मिल जाएगी
उन आम अधूरी बातो को
जो कविता कभी न बन पायीं।

~ सूफी बेनाम





Tuesday, May 12, 2015

अल्फ़ाज़ों का बदन

शिगुफ्ता  बदन की साँसों के
इतना करीब होना एक शिफ़ा है।

सलीक़ा तेरी अंगुलिओं में
हकीक़त की अदा से ज़्यादा है।

फिर -फिर तेरी दानिश कथनी ने,
अल्फ़ाज़ों का बदन टटोला है।

जब नींद लदी, तेरी आँखों से
मेरी किताब का आँचल छूटा था।

जिल्द पे लिखे मेरे नाम में भी
शोखी उम्मीद से जागी थी।

कुछ सांस भर ली थी मैने भी
एक रूहानी बदली छायी थी।
~ सूफी बेनाम




शिगुफ्ता - flourishing, blooming; शिफ़ा - healing; दानिश - wise ; शोखी - sauciness, naughtiness.

Saturday, May 9, 2015

आज हो जाने दो कागज़ी तारिख मेरी

रोश उतना ही होगा दिल का सवाब
जितना उमीदों के शहर जल निकलें।
आज हो जाने दो कागज़ी तारिख मेरी
शायद किसी शोख लबों से बह निकलें।
या तो शादाब होगा हालात -ए -नियात
या तग़ाफ़ुल को कोई खबर निकले।
है दिल्लगी गर नीयत शोख़ मेरे माशूक की
नहीं तो तहे जिल्द में सिमट निकलें।

~ सूफी बेनाम



नियात - desire ; तग़ाफ़ुल - ignorance; शादाब -bliss; रोश - रोशन - illuminate;
शोख - playful ; खबर - attention ; सवाब - re-compensation; शोख़ - saucy