Monday, October 7, 2013

नज़्म

मैंने अपने दो कच्चे मिसरों को
तुम्हारी नज़्म के साथ
डायरी के पन्नों में लपेटकर
साथ सुला दिया है।

बुक - मार्क भी नहीं लगाया है।

सिमटे सहमे वो कच्चे मिसरे
तुम्हारे अंदाज़ खोज ही लेंगे
एक डिक्शनरी भी साथ रख दी है
गर बात आगे बड़ी तो खुद बा खुद समझ लेंगे

उम्मीद है रात महफ़िल
तो सजी ही होगी
और हमारे सवालों को
एक नज़्म ने छुपाया होगा।

~ सूफी बेनाम


सौदा

लम्हों की भारी किश्तों पर
कुछ और ज़र्रे बहके होंगे
कुछ कीमतें टूटी होंगी रिश्तों की
सोचता हूँ  आज फिर बाज़ार चलें।

सुर्ख-फरेब की झिलमिलाती दुकानें
के महंगे-सस्ते सौदों पर
छोटी-बड़ी कीमतें देकर
सब बिकने को तो आये हैं।

~ सूफी बेनाम


शौक

मेरी रिहम को
इतने करीब से देखा न कर ए दिलबर
ये ज़ख्म शौक के इस जानिब पाल के रक्खे हैं
कोई रिज़ालत नहीं है यहाँ
ये ज़िन्दगी को अंजाम की दुआ देते हैं।

उसे यूं हयात का मर्ज़ हुआ
जो रिस्ता रहा लबो-लहजा बनकर
वफ़ा तो फुर्सत में नब्ज़-ए-सबक बनी
हमने भी उसे प्यास पे बुझने ना दिया
उल्फत से जलायेंगे उसे पानी बनकर।

~ सूफी बेनाम

रिहम - womb;  रिज़ालत - low-deeds; जानिब - side; हयात - life; लबो लहजा - articulation, way of speaking.


Thursday, October 3, 2013

सौदा

लम्हों की भारी किश्तों पर
कुछ और ज़र्रे बहके होंगे
कुछ कीमतें टूटी होंगी रिश्तों की
सोचता हूँ  आज फिर बाज़ार चलें।

सुर्ख-फरेब की झिलमिलाती दुकानें
के महंगे-सस्ते सौदों पर
छोटी-बड़ी कीमतें देकर
सब बिकने को तो आये हैं।

~ सूफी बेनाम


नज़्म

अब तो भीग चुके
बरसात को
बादलों के गरजने
के पहले।

जाने क्या छूटता 
सा पीछे रहा 
एक  रोज़ जो आसमा 
था पहले। 

अजब एक इकरार को
ज़िन्दगी आगे बड़ी
जहाँ सब कुछ थमा-थमा
था पहले।

मेरे दिल के निशां 
महसूस तो कर 
ज़िन्दगी में तर्जुमा आने 
के पहले।

कुछ मुनासिब ना सही
एक नज़्म तो हो
और नये रास्ते समझ आने
के पहले।

~ सूफी बेनाम


Thursday, September 26, 2013

शोर

शोर सड़क का और
दिन का कोलाहल थमा
तो घर पर बच्चों
के लड़ाई झगड़े
बर्तन , घंटी , पानी
कभी सीरियल कभी
चीख़ पुकार
रात को ए सी की आवाज़
खिसकती चिटकनी
घड़ी की टिक-टिक
और फिर सांसों की खुशबू - उलझन!

कुछ देर को लगता रहा
कि क्यूं इतनी आवाजें
रहती थीं पार करने को
क्या तुम्हारी सांसो
तक पहुँचने को ?
फिर लगा की
श्रंखला की एक कड़ी
जिसमे छाँव दर्पण रही
मन भीचने को
एक सहारा रात का था
ज़िन्दगी वहीँ से शुरू होती थी
हर रोज़ शोर में बदलकर।

~ सूफी बेनाम


Wednesday, September 18, 2013

अधूरी- मुलाकातें

मैंने भी सबक यही लिया इस दोस्ती से,
आग तो चिंगारी से लगती ज़रूर है।

जिस तरफ झांकना भी हमको था मना
आस दर्द को उस तरफ से आती ज़रूर है।

रोज़ मिलने से भी कुछ होता नहीं रफ्ता-रफ्ता
मेरी यादें चंद लम्बी दोपहरों की कर्ज़दार ज़रूर हैं।

अधूरी इन मुलाकातों से हम उब चुके हैं
कभी-कभी काजल और बिन्दी को बेताब ज़रूर हैं।

हुस्न को जिस्म से नहीं महक से समझकर देखेंगे
ज़िन्दगी नये नये ज़रिये दिखलाती ज़रूर है।

मेरा क्या है बेनामी की शौहरत कितनी भी हो
इन मुलाकातों को बईमान जस्बे कबूल नहीं।


~ सूफी बेनाम