Saturday, January 16, 2016

मतलब से खुद को पूछते हैं

मेरी रिज़ालत में गूंजते हैं
तेरी अकीबत को पूछते हैं

लफ्ज़ ओंठों पे रह गये जो
तन्हाई में फिर क्या ढूँढ़ते हैं

लौटे किस्मत से टकरा फिर
क्यों ठंडी दीवार पे गूंजते हैं

है सर-गर्मी दीवारों के पार
जहाँ अपने अपनों को चूमते हैं

तुमने दिखायी परदाज़ मुझको
कि इबादत असर  आवारगी है

अब तल्ख़ मुझो है अक्स भी
ग़र्क़ जज़बात औ अधूरे चेहरे

अब ऐसी आदत पड़ी है तेरी
खुद से मतलब फ़क़त ढूँढ़ते हैं

~ सूफी बेनाम




तल्ख़ - distasteful
ग़र्क़ - sunk
रिज़ालत - lowness/worthlessness,
परदाज़ - adorn/perform,

अक्सर

अक्सर हो गया था कभी-कभी का मिलना लेकिन 
तमाम बंदिशों से गुज़रकर भी हर रोज़ अक्सर था 
है इल्म कि बीताया है खुद को, इस दौर में अक्सर 
अक्सर रह नहीं पाते खुदी में जो रोज़ मिलते हैं। 

~ सूफी बेनाम


एक किता में समझौता कर गये

शायद ख्याल से जलकर गये
मिसरों से अंदाज़ सुलगकर गये

हाय जो फ़िरते थे आवारा राह में
किस तरह काँटों से फटकर गये

जो चपके रह गये थे जिल्द से
वो हवाओं में सर पटककर गये

हर हर्फ़ जब था ज़रूरी मश्क़ का
एक किता में समझौता कर गये

वो ख्याला ग़ज़ल आज़ाद रही
शम्स को मेरी हिरासत कर गये

~ सूफी बेनाम


उस शाम नवेली थी जो आज पहेली है

बस हर्फ़ से दिलों का इज़हार नहीं होगा
अब यूं मुह मोड़ने से इंकार नहीं होगा

एक बार लगा ऐसा शायद तू हमारी है
धोखा हुआ जो हमको हर बार नहीं होगा

इसदिन की बातों को उस दिन दोहराना
इकरार हमारा फिर बेज़ार नहीं होगा

उस शाम नवेली थी जो आज पहेली है
हयात की कश्ती में पतवार नहीं होता

उस रोज़ मसीहा थे तेरे शाम के वादों पे
शामों का कौसर अब खुमार नहीं होगा

हम हौले चलते हैं अपने ही नसीबा पे
रफ़्तार जला कोई औज़ार नहीं होगा

हैं दिल सा नादां जो सांसों पे चलता है
है रूह ख्याला क्यों एतबार नहीं होता

~ सूफी बेनाम



Thursday, January 7, 2016

मेरे बाद शायरी

कोई यूं गुनगुनाता है शामों को शायरी
ज़िंदा रखेगी मुझको मेरे बाद शायरी

हर शेर को गिरह तक छू कर देखा
उसे और भी छुएगी मेरे बाद शायरी

ज़िंदा है स्याह कागज़ जानता हूँ मैं
दहकायेगी मेरा रम्ज़ मेरे बाद शायरी

इतने दीवाने फिर भी सरगोशियों से दिन
शाम लबों से छलकेगी मेरे बाद शायरी

सांसों की भसक नब्ज़ सधी रही है रोज़
दीवानों की रक्तिम रहे मेरे बाद शायरी

उम्मीद तो यही थी किसी दर्द को कहे
लगता है होगी हमदर्द मेरे बाद शायरी

लम्हा नहीं अरसों है ज़िन्दगी के साथ
किसी हो के जियेगी मेरे बाद शायरी

अब तक जिसे ग़ज़ल में बांधता रहा
गीत बन खिल उठेगी मेरे बाद शायरी

अल्फ़ाज़ों की गिरह में गर तू भी बहेगा
तुझो डुबो चलेगी मेरे बाद शायरी
~ सूफी बेनाम



Saturday, January 2, 2016

नया साल 2016

काफ़िया – आये
रदीफ़ – साल ये
मिसरा : इक नई उम्मीद लाये साल ये
फिर मजलिस जमाये साल ये
फिर मौका मुलाकाते साल ये

नज़र की शुआओं में रौश को
काजल तलक सुलगाये साल ये

तेरी नायाब ख़ुशी का वरिसां
मुझको यूं ही बनाये साल ये

फिर तेरी उम्मीद मेरी आरज़ू
उल्फ़त बकाया किराये साल ये

गर मज़हबी हो हसरते महीना
मैं तेरा मुसलमा सजदे साल ये
~ सूफी बेनाम


Sunday, December 27, 2015

ग़ज़लों में जज़्ब छुपते नहीं हैं हर किसी से


शब्दों के पायाब में डूबते नहीं हैं हर किसी से
ग़ज़लों में जज़्ब छुपते नहीं हैं हर किसी से

मिसरों से बेहतर रहता इंसा का नेक इरादा
मुस्कान उभरती नहीं दिल से अब हर किसी से

ज़ेर-ओ-बाम को है उसने फिर रूज से जलाया
रुखसार हो गये हैं कीमिया उसकी ही हंसी से

बूंदों की छनक से हैं तलब आसमा बरस-ते
शफ़क़-ए-चमक से है ज़र-ए-ज़ेवर अब किसी से

तेरी रंग-ओ-बू में बसर है मेरी तलब के किस्से
हर ख्वाब था बसाया तेरी ज़ुल्फ़ की नादिरी से

बेनाम इस सिलाह की बेचैनीयाँ  तो समझो
ग़ज़ल में नहीं मिलते मक़सद हर किसी से
~ सूफी बेनाम



पायाब – ankle deep water, ज़ेर-ओ-बाम – low and deep sound, रूज – rouge, कीमिया – alchemy, रुखसार – cheek , शफ़क़-ए-चमक – evening twilight, ज़र-ए-ज़ेवर – golden jewellery, नादिर – priceless.