Wednesday, February 11, 2015

बेनियाज़

इंसानी बेकसी, तजरीबों की रच-बुन
आग में डूब के निकलना है, इस जहाँ से।

वो हुस्न बेशुमार ही क्या जो
उम्मीद में ख़लल न पैदा कर दे।

वो इश्क़ बेमिसाल ही क्यों जो
दिल जला कर छलनी न कर दे।

वो दोस्ती बेइन्तहां ही कैसी जो
सबसे प्यारी चीज़ न छीने ले।

इंसान को बेनियाज़ बनाती है दिल्लगी
दर्द-ए-चाहत से गुज़रा - अकेला तो हो।

~ सूफी बेनाम

बेनियाज़ - carefree.


Monday, January 19, 2015

बेवक़ूफ़-ड्राइवर

गर मैं
ड्राइवर होता
तो शायद
मालिक की गाड़ी को
मालिक की समझकर
चलाता।

रोज़ साफ़ करता
जहाँ मालिक चाहता
वहां गाड़ी ले जाता।
जब-तक मालिक पेट्रोल डलवाता
तब-तक गाड़ी चलती
मैं बस तनखा में रह जाता।

पर जबसे तनखा बंद हुई है
खुद को मालिक
समझे बैठा हूँ ,
औकात बस
ड्राइवर की है
अपनी गाड़ी
समझे बैठा हूँ।

~ सूफी बेनाम









जलौनी ( Fire-wood)


दिन भर के किस्से
कैसे मौसम-बिखरे
तूफ़ान-उजड़ी सूखी टहनियाँ
बटोर-बटोर कर
शाम को सिर पे लादे
बूखी अंतड़ियों में लिपटी सांसें
इस उम्मीद पे चला मैं
घर के रास्ते,
कि शायद इस बार की बटोरी से
आग तेज़ दहकेगी।
पर सब्र रखना होगा
शायद, कुछ लकड़ियाँ गीली है
आंच कम और
धुआं दे-दे  के जलेंगी
रुलायेंगी।

~ सूफी बेनाम


Sunday, January 18, 2015

इल्म को समझूँ, या अलीम को जनूँ ?

इल्म को समझूँ ?
या अलीम को जनूँ ?
महोब्बत को समझूँ ?
या चेहरों की पहचान रखूँ ?

बयाबान -ए -बशर में
मिला नहीं मुझको सुकूँ अब।
दिन बेकस से रहते क्यों ?
रात बेईमानी से गुज़र जाती  हैं।

मुक़ीर-ए-चाहत की बेपर्दगी को
अंजाम -ए-मोहोबत का सिला
ज़िन्दगी जी लेने पर जिस्त को
बेनामी की सजा मंज़ूर सी है।

~ सूफी बेनाम


Sunday, January 4, 2015

........... नाम लिखा देखा है

........... नाम लिखा देखा है

एक ग़ज़ल की किताब पे
तुम्हारा नाम लिखा देखा है
न सही ज़िन्दगी के दरमियान
पर तुम्हारा ख़्वाब खिला देखा है।

बहुत हैं वाक़ियाँ छुपे ढके
इन कागज़ों के गिलाफ़ में
शायद सांसो से थमा नहीं
जो कई महफ़िलों का नसीब था।

होंगे कोरेपन पे गुंथे हुए
हसरतों के कारवां
थोड़ी अनसुनी, बेनियाज़ सी
तेरी ज़िन्दगी की दास्तां।

~ सूफी बेनाम

बेनियाज़ - carefree,



( I wrote this after reading the some works and life of Parveen Shakir)


Monday, December 8, 2014

सूखे पत्ते

क्यों साकित हैं ये सूखे पत्ते ?
ज़मीं को कहकशां सा सजा रखा है
मानो थक के गोद में लौटे है माँ के बच्चे
यहाँ मैदान में कोहराम सा मचा रखा है।

जो राहों को तकते रहे सूखने से पहले
आज हर पहचाने रास्ते को ढक गये है
ऊंचे घने दरख्त भी इन-बिन अधूरे
इन ठूंठों को उधाड़ा कर गये हैं।

जिस्म की शाख पे अख़्ज़ ये लाख पत्ते
तेरे लम्स से जग कर ताज़ा हुए थे
कहीं पीत कही सुर्ख शादाब था इनका
किसी बेरुखी से ये खफा हुए हैं।

बेसाध आस्मा की चाहत में बंधकर
हर शाख में गुल महक उठे  थे  
रंगों की फितरत में बंधा जब न था तू
तब खुशबू से जंगल सराबोर हुऐ  है।

कहीं शर्मसार जड़ों ने ज़मीं से उलझकर
फ़िज़ा को छाँव-गुल के महके वादे किये थे
तुम रहे मदहोश-आसमां में बिखरे अधूरे
मै भी ज़मीन-ए-शिददत से जकड़ा रहा हूँ।

जो बिछड़े हैं  डालों के रिश्ता-ए-पकड़ से
वो  मौसम-ए-रुखसत तक रंगीन रहे थे
लिए यादों के मौसम और कई हज़ार लम्हे
वो सूखे से ज़मीन पे बिखरे हुऐ हैं।

रुकता नहीं कोई इनको छूने-पलटने
न ही कोई इनकी फरियाद सुन पाया
दबे पाँव हवा के झोंको में सिसक कर
इस जहाँ को बादे-वफ़ा कह गये हैं।

तुम खुदा हो जहाँ के, तो बस वहीं टिके रहना
यहाँ हज़ारो की तादाद में दिल लुट रहे है
बेज़ुबां-ए-बशर को समझना परखना
बदलते मुक्क़दर के बस में नहीं है।

मैं कुछ देर रुकूँ ? या रुका क्यों यहाँ मैं ?
जहाँ नासमझी में कई सर सजदे में झुके हैं
मेरी शाखों में चाहत इंसा की है बस
कई खुदा आसमा पे लुट -मर रहे हैं।

जो बिछड़े हैं  डालों के रिश्ता-ए-पकड़ से
जो  मौसम-ए-रुखसत तक रंगीन रहे थे
लिए यादों के मौसम और कई हज़ार लम्हे
वो सूखे से ज़मीन पे बिखरे हुऐ हैं।

~ सूफी बेनाम




(साकित - dropped fallen lost, अख़्ज़ - grasp, शादाब - freshness).





Sunday, November 16, 2014

फ़राज़ न तुझसी नज़र मेरी

फ़राज़ तुझसी न निगाह मेरी
न नज़र में सूद -ओ-ज़ियान के
खाते बे-शुमार लदे
न अंधेरों में सिराज से
मेरे अश्क में सपने घुले।  

महोब्बत को कभी न लिख सका
न नेमत-ए-ज़ीस्त जैसे तेरे
न दीवाने तुझसे कोई मेरे
पर शायर हूँ तेरे जिंस का
लकीरों को ही लिख रहा।

ख्याल, परवाज़-ए-फ़राज़ का
ता जींद ज़ेर-ए-लब रहा
ये  सुरूर-ए- ख़ैर ये सलाहियत
मेरी ज़िन्दगी का पड़ाव थे
आज दर्द ही मुतरिब है।

मैं गुरेज़ नहीं गुस्ताख़ था
मुझे  शक नहीं था कभी मगर
मैं यकीन भी न कभी कर सका
रहे लब पे शीरीं अल्फ़ाज़ तेरे
एक सदी थी जो काट गयी।

बेक़रार है, कलम की थोर मेरी
और स्याही में सहलाब है।
कुछ अल्फ़ाज़ से दुआ तो है
की कागज़ों में जगह तो दें
एक उम्र से बेनाम हूँ।

~ सूफी बेनाम



सिराज - lamp ; सूद -ओ-ज़ियान - profit and loss ; नेमत-ए-ज़ीस्त - gift of life; जींद - life; गुस्ताख़ - arrogant ; ख़ैर- welfare; सलाहियत - capability, caliber ;  फ़राज़ - elevated; ज़ेर-ए-लब - whispers; गुरेज़ - one who escapes, fugitive; शीरीं - sweet; थोर - nib; मुतरिब - singer, minstrel.