Monday, July 3, 2017

ज़िन्दगी कुछ तो बता इस बेइमानी की वजह

2122-2122-2122-212
ज़िन्दगी कुछ तो बता इस बेइमानी की वजह
क्यों हैं अब भी ख्वाब महके रातरानी की वजह

फिर नहीं हम रूबरू हो पाये, दोस्तों की तरह
है बनी जबसे ये हसरत, ज़िन्दगानी की वजह

आपने दो गज़ की दूरी पे हमे रक्खा सनम
ढूँढते ही रह गये हम, सावधानी की वजह

जब मिला, उलझा हुआ, हमको मिला, आशिक मेरा
कोय तो हमको बताओ, इस कहानी की वजह

इस गज़ल में राबता हमसे बना है इसलिये
शेर में गर मैं ऊला हूँ, तुम हो सानी की वजह

ज़ुल्म जो हमपर किये सब मुस्करा कर के किये
अब चलो हमको बतादो महरबानी की वजह

दर्द में हसने की आदत है हमें उस दिन से ही
फकत गर तुम समझ पाओ बदगुमानी की वजह

- सूफी बेनाम


सर फिराना उम्र को नहीं भा रहा

2122-122-2212-22
इश्क नाकाम हो इस दफा ठीक है
सर फिराना उम्र को नहीं भा रहा

इस कदर रूठी हैं सब जवां हसरतें
पर मनाना, हमें तो नहीं आ रहा

रट चुके वो पहाड़े सौ तक, पर उने
ये गणित अब मैं समझा नहीं पा रहा

जाइये ढूंढ़िये कोइ सतही मिले
अब मैं गहराई में डूबने जा रहा

~ सूफ़ी बेनाम

Disclaimer : ये गज़ल किसी के लिये नहीं लिखी गयी है, इसको लिखते समय न किसी जानवर की हत्या हुई न ही कोइ दिल तोडा गया . धूम्र पान सेहत के लिये हानिकारक है .



दर्द की मण्डी में है ज़्यादा मिला

2122-2122-212

दर्द की मण्डी में है ज़्यादा मिला
इश्क का तोड़ा हुआ ताज़ा मिला

भाव अब भी लग रहा चढता हमें
कम हैं ग्राहक तब भी क्यों आधा मिला

है किसानी हुस्न की मालूम है
जब मिला बरसात का मारा मिला

एक जवां मौसम की ज़िम्मेदारियां
कर्ज़ में डूबा वो बेचारा मिला

- सूफी बेनाम



जो भिगोती थी हमें हर रोज़ केरल की तरह

2122-2122-2122-212
जो भिगोती थी हमें हर रोज़ केरल की तरह
हो गयी है आज हमसे रूठ, राजस्थान वो

हसरतें मेरी बिहारी सी हमेशा ही रहीं
कर गयी है ज़िन्दगी, आज़ाद हिन्दुस्तान वो

हम हुए फिर से जवां जबसे हुई कश्मीर तू
सुन बनी आतंकवादी, मेरी राहत-जान वो

रोक है हर शौक पे मेरे लगी गुजरात सी
इत्मिना अब भी नहीं है, मेरी आफ़त-जान वो

यूँ नहीं बिन सोच-समझे, हम हुए हरयाणवी
जट्ट बुद्धि से ही बनता है बड़ा इन्सान वो

~ सूफ़ी बेनाम







Monday, May 29, 2017

उढ़ेल दिया करो

आते-जाते
कोनों में टकरा कर
लबों के उभार पर
लबों को
उढ़ेल दिया करो।
कुछ पीते-रहने का
मन करता है
निढाल पलों के
निशी-कर को
एक
चुम्बन दे दिया करो।
~ आनन्द


या फिर

बहुत बंजर बहुत सूखा हुआ बादल मुझे कर दो |
दया ममता न हो जिसमें वही आँचल मुझे कर दो |
सिखा दो ए खुदा दुनिया को तुम चाहत के ढंग या फिर ,
नहीं होता है यूँ तो यूँ करो पागल मुझे कर दो |
~ आनन्द


फिर गुलिस्तां में घर जा बसाना पड़ा

भोर-भूला, तुमी हो बताना पड़ा
कैस की असलियत को छुपाना पड़ा

था ज़रूरी नहीं आपको कुछ मगर
हर बहाने को ज़रिया बनाना पड़ा

शर्त दर शर्त थी हमने हारी मगर
वस्ल का दौर हमको भुलाना पड़ा

यूँ न धोया करो इश्क़ की मैल को
मस्क रातों में फिर से जगाना पड़ा

आपने सादगी को है ओढा हुआ
इसलिये घर हमीको सजाना पड़ा

कुछ तो आफत बनो नाजनी गुलबदन
फालतू में हमे कुनमुनाना पड़ा

था सुलगता हुआ कश पे कश रात भर
खांसते-खांसते दिन बिताना पड़ा

याद रहता नहीं कोइ चहरा हमे
हर किसी को हमे पास लाना पड़ा

ढूँढता रह गया आप की गंध को
फिर गुलिस्तां में घर जा बसाना पड़ा

~ सूफी बेनाम (आनन्द खत्री )