Tuesday, May 12, 2015

अल्फ़ाज़ों का बदन

शिगुफ्ता  बदन की साँसों के
इतना करीब होना एक शिफ़ा है।

सलीक़ा तेरी अंगुलिओं में
हकीक़त की अदा से ज़्यादा है।

फिर -फिर तेरी दानिश कथनी ने,
अल्फ़ाज़ों का बदन टटोला है।

जब नींद लदी, तेरी आँखों से
मेरी किताब का आँचल छूटा था।

जिल्द पे लिखे मेरे नाम में भी
शोखी उम्मीद से जागी थी।

कुछ सांस भर ली थी मैने भी
एक रूहानी बदली छायी थी।
~ सूफी बेनाम




शिगुफ्ता - flourishing, blooming; शिफ़ा - healing; दानिश - wise ; शोखी - sauciness, naughtiness.

Saturday, May 9, 2015

आज हो जाने दो कागज़ी तारिख मेरी

रोश उतना ही होगा दिल का सवाब
जितना उमीदों के शहर जल निकलें।
आज हो जाने दो कागज़ी तारिख मेरी
शायद किसी शोख लबों से बह निकलें।
या तो शादाब होगा हालात -ए -नियात
या तग़ाफ़ुल को कोई खबर निकले।
है दिल्लगी गर नीयत शोख़ मेरे माशूक की
नहीं तो तहे जिल्द में सिमट निकलें।

~ सूफी बेनाम



नियात - desire ; तग़ाफ़ुल - ignorance; शादाब -bliss; रोश - रोशन - illuminate;
शोख - playful ; खबर - attention ; सवाब - re-compensation; शोख़ - saucy  

Friday, May 1, 2015

ऐ अफ़रोज़ा

ऐ अफ़रोज़ा !
तेरे हर आलम,
हरकत-शरारत के ज़ेरे हिरासत
वो जवानी का फितूर
जो हर जुम्बिश
हर शक्ल-औ-अदा में
बेसब्र उफनता था
कहीं अपने शर्मीले बचपन को
बदमस्त बदन की तहों में
दबा सा गया था;
वो रिश्ता दर रिश्ता
जूझता-जीतता, बढ़ता-बदलता
उस मंज़िल पे ले आया जहाँ
पीछे मुड़ के कुछ देर
देखना भी मुमकिन न था,
जब तू
औरत बन के खिली-बिखरी
तासीर-ए-खुशबू की तरह,
और तेरे जिस्म के
नूर -ए-नक़्श    
किसी मुकाम पे जा कर
खुद को उस अक्स से तोलते रहे
जहाँ से उभर के तू आयी थी,
तेरे उस बदलाव-ए-सफर
उस बाहरी रंग-ए-इश्क़ का
चाहने वाला भी
अब नज़र कमज़ोर कर बैठा है।

तेरे जिस्ता-ए-कुण्ड की खुशबू
अब उन रगों की हिरासत है
जो अपनी रवानी में तेरी जवानी को
बदन की तहों में दबा सी गयी हैं।

हर उस याद को
जिस्म-ए-रेगिस में ढूंढने को,
मुक़म्मल करने को ,
तेरे बदन पर कुछ सांसें लिये
सूँगता टटोलता, करीब आता है
और उन पोशीदा चौबारों में
छिप जाना चाहता है।

तेरा हम-मुसाफिर
शायद अपनी जवानी
तुझमें खो देना चाहता है।

~ सूफी बेनाम



Thursday, April 16, 2015

फैसला

तुमको तहरीर में
जी लेने का हौसला मेरा
ज़िन्दगी लिख के बिता लेने का
फ़लसफ़ा मेरा
वो जो बेनाम रहा, गुम रहा
मुद्दतों की कालिख में,
उसे अल्फ़ाज़ों में
तराशने का फैसला मेरा।

~ सूफी बेनाम 








एक दोस्ताना बियर

ज़िन्दगी एक दोस्त की तरह
गुज़र हो आयी
जब मिली बस, और भी भाने लगी
मुझको तन्हाई
थे बरस वो खामखाँ ही बीतते
पिसते ढुलकते
उस मुकाम पे ढूँढ़ते थे तुझको जहाँ
दोस्ती छोड़ आयी
हर मुलाकात पे खिल उठती है
ख्वाबगाह कोई
जहाँ हक़ीक़त से तिलमिलाते सपने
वज़ूद बेचते थे
वहां कतार दर कतार उम्मीदें बिछी
देखीं है हमने
एक भरी दोपहर की दोस्ताना बियर से
थी आँखों में नमी उत्तर आयी।
~ सूफी बेनाम




Monday, March 16, 2015

बदल जाते है रंग ठूँठ के, औ तुझे दिखता पलाश है ?

ये संग रंग-ए-पलाश है
नफ़स आसमां पे लिखा हुआ
हर रंग नहीं पलाश है
रिन्द-ए-मौसम पे जला हुआ।

तू समझ कि रंग औ ज़िन्दगी
कभी गुज़र नहीं किसी नाम के
वो  बेरौनक एक ठूंठ था
जो आज दिखता पलाश है।

ये शाम, ये जज़्ब बहार के
औ ये फूल भी पलाश के
ये खुद परास्त कुछ ख्वाब हैं
चाहे नाम दे या भूल जा।

~ सूफी बेनाम



Thursday, March 5, 2015

फागुन का त्यौहार

मैने देखा हिना-सजी हथेलियों को
अंजुमन में रंग, रंजित ज़बी करते हुए।
चूड़ियों में चिपचिपाहट चाशनी की
मौलपुए वारिदों का स्वाद बनते हुऐ।

हो रंग को तासीर आदमी का बदन
शौक हो तुमको भी रंग भरने का
निढाल रगों में ख़ाक जो ख्वाइशें
उनको सहारा नशा-ए-चाँद पे उभरने का।

तुम तलक भी कोई रंगी हुई हथेली पहुंचे
रहे तुमको भी मौका किसी के पागलपन का
बह उठे हिना मेरे अक्षरूं से पिघलकर
कुछ नया सा नज़ारा हो शाम-ए -फागुनी का।

~ सूफी बेनाम

ज़बी - forehead; वारिदों - guests/incoming visitors